पूर्वोत्तर के एक छोर पर बसा शांत और सुरम्य त्रिपुरा पर्यटन पर जाने के लिए आदर्श जगह है। हरियाली ओढ़े लंबी-गहरी वादियां, घने जंगल, कुछ बेहद खूबसूरत महल, मंदिर और बौद्ध मठ। कुल मिलाकर त्रिपुरा ऐसी सुंदर जगह है जो आपको रोजमर्रा की चिंताओं को भूलने को मजबूर कर देगी। त्रिपुरा भारत का दूसरा सबसे छोटा राज्य है। लेकिन इसका इतिहास अति समृद्ध है। महाभारत कालीन इतिहास-साहित्य में भी इस धरती का जिक्र मिलता है। माना जाता है कि देवी त्रिपुर सुंदरी के नाम पर ही इस राज्य का नाम त्रिपुरा पड़ा और इसलिए यह देवभूमि है। त्रिपुरा में अधिकतम समय माणिक्य राजवंश का शासन रहा है। 1947 में आजादी के साथ ही इस राज्य का भारत में विलय हो गया। 1972 में इसे अलग राज्य का दर्जा मिला। 

त्रिपुरा के अधिकतर वासी वैष्णवी हैं और यहां अनेक हिंदू व वैष्णव मंदिर हैं। इनमें सबसे बड़ा जगन्नाथजी मंदिर है जिसका वास्तुशिल्प दक्षिण भारतीय मंदिरों से प्रेरित है। शहर से 14 किलोमीटर दूर पुराने अगरतला में चतुर्दश देवता मंदिर भी अति सुंदर है, जहां 14 देवियों की पूजा होती है। हालांकि त्रिपुरा के अधिक महत्वपूर्ण मंदिरों को देखने के लिए अगरतला से 55 किलोमीटर दूर उदयपुर जाना होगा। इनमें माताबारी के नाम से भी पुकारे जाने वाले माता त्रिपुरा सुंदरी मंदिर को देखने सबसे ज्यादा लोग पहुंचते हैं। 500 वर्ष प्राचीन यह मंदिर बंगाली चार-चाला स्थापत्य कला में निर्मित है। इसमें काली माता की मूर्ति की प्रतिमा स्थापित है, जिन्हें लोग त्रिपुरा सुंदरी या त्रिपुरेश्वरी पुकारते हैं। यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है इसलिए भी इसकी मान्यता अत्यधिक पवित्र स्थल के रूप में है।

लाल रंग के इस मंदिर में शक्ति मां को प्रसन्न करने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं और यहां दिन भर कई तरह की व्यापारिक व सामाजिक गतिविधियां जारी रहती हैं। उदयपुर का अन्य प्राचीन मंदिर है भुवनेश्वरी मंदिर। 17वीं सदी में निर्मित यह मंदिर गोमती नदी के तट तथा पुराने शाही महल के करीब है। यह महल आज खस्ताहाल है परंतु इस मंदिर का स्थल तथा स्थापत्य कला स्वतरू ही मन में आदर-भाव पैदा करती प्रतीत होती है। यह वही शक्ति व आभास है जिसने कइयों को प्रभावित किया है, जिनमें महान लेखक रबीन्द्रनाथ टैगोर भी एक हैं। उन्होंने इसे अपने उपन्यास तथा नाटक का हिस्सा बनाया है। 

त्रिपुरा का एक अन्य बेहद सुंदर आकर्षण नीरमहल है जो अगरतला से 54 किलोमीटर दूर है। इस महल में नाटकीय मुगल शैली वास्तुशिल्प है। रुद्र सागर झील से घिरे इस महल के साथ लुका-छिपी खेलते सूर्य के शानदार नजारे को देखने के लिए डिंगी नौका की सैर सर्वोत्तम है। झील में कमल के फूलों के बीच मौजूद कई तरह के पक्षी भी मन मोह लेते हैं। शाम के वक्त इस महल में सुंदर रोशनी की जाती है। 

कैसे पहुंचे

हवाई मार्ग सेः त्रिपुरा की राजधानी अगरतला, देश के विभिन्न शहरों से हवाई मार्ग से जुड़ी हुई है। सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के विमान यहां नियमित अंतराल में आते रहते हैं। कोलकाता और गुवाहाटी से हवाई मार्ग से यहां पहुंचने में 45 मिनट से भी कम समय लगता है। राज्य के तीन और शहरों खोवाई, कमलपुर और कैलाशहर में एयरपोर्ट हैं। यहां चार्टर्ड प्लेन और छोटे विमान आसानी से उतर सकते हैं।

सड़क मार्ग सेः नेशनल हाइवे नंबर 44 अगरतला को शिलांग के रास्ते गुवाहाटी से जोड़ता है। यहां से गुवाहाटी 24 घंटे में पहुंचा जा सकता है। लेकिन भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि इसकी बजाय बांग्लादेश के रास्ते त्रिपुरा पहुंचना ज्यादा आसान है।

रेलमार्ग सेः अगरतला का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन कुमारघाट है। यह अगरतला से 140 किलोमीटर दूर है। कुमारघाट से गुवाहाटी के लिए रेल चलती है। गुवाहाटी रेलवे का बड़ा केंद्र है और यहां से पूरे देश के लिए रेल सुविधा है।