दक्षिण दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन स्थित तब्लीगी मरकज जमात के मुखिया मौलाना साद एक विलेन के तौर पर उभरकर सामने आए हैं। दरअसल, तब्लीगी मरकज जमात में हजारों की संख्या लोग जमा थे, लेकिन मौलाना साद ने गैरजिम्मेदाराना व्यवहार करते हुए इसकी जानकारी पुलिस और दिल्ली सरकार तक को नहीं दी। जानकारी मिली है कि मौलाना साद 28 मार्च से ही फरार हैं। आइये जानते हैं कि कौन हैं मौलाना साद, जिनकी दिल्ली पुलिस को तलाश है।

बता दें कि मौलाना साद का जन्म दिल्ली में 10 मई, 1965 में हुआ और उनके पिता का नाम मोहम्मद हारून है। मौलाना साद का पूरा नाम मुहम्मद साद कंधालवी है। साद कंधालवी ने हजरत निजामुद्दीन मरकज के मदरसा काशिफुल उलूम से 1987 में आलिम की डिग्री ली है। साद तब्लीगी जमात के संस्थापक के पड़पोते हैं। मौलाना साद खुद को तब्लीगी जमात के एकछत्र अमीर घोषित कर चुके हैं।

बताया जाता है कि जून, 2016 में मौलाना साद और मौलाना मोहम्मद जुहैरुल हसन ने नेतृत्व वाले तब्लीगी जमात के दूसरे ग्रुप के बीच हिंसक झड़प हो गई थी। इस दौरान पक्ष के लोगों ने एक दूसरे पर पथराव तक किया था और इसमें कई लोग घायल भी हुए थे। इस हादसे के बाद दोनों गुटों के बीच दूरी बढ़ गई जो अब भी जारी है।  दारु उलूम देवबंद भी पिछले तीन साल से मौलाना साद से नाराज है और उसने इस बाबत साद के खिलाफ फतवा तक जारी किया था। फतवे के मुताबिक, मौलाना साद अपने ब्याख्यानों में कुरान की गलत व्याख्या करते हैं। 

बताया जा रहा है कि तब्लीगी जमात के मौलाना साद का एक कथित ऑडियो भी सामने आया है। इसमें वह आपत्तिजनक बयान देते हुए सुनाई देते हैं। वह कहते हैं-'मरने के लिए मस्जिद से अच्छी जगह नहीं हो सकती।' बता दें कि तबलीगी जमात भारतीय उपमहाद्वीप में सुन्नी मुसलमानों का सबसे बड़ा संगठन है। तबलीगी जमात के पूर्व अमीर मौलाना जुबैर उल हसन ने संगठन का नेतृत्व करने के लिए के सुरू कमेटी का गठन किया था। जमात एक समूह को कहते हैं, जिसमें पांच से ज्यादा लोग शामिल होते हैं। 

जमात की अवधि तीन दिन से शुरू होती है और 40 दिन और चार महीने से लेकर पांच माह तक की होती है। जमात के लोग इस अवधि के लिए एक क्षेत्र को चिन्हित करते हैं, इसके बाद वहां की मस्जिदों में दो से तीन दिन रुककर इस्लाम कर प्रचार करते हैं। इसके बाद दूसरी मस्जिद का रुख करते है। 40 दिन, चार और पांच माह की जमात की समय अवधि जब पूरी होती है तो वह तब्लीगी मरकज जाते हैं। पांच माह की जमात विश्व के कई देशों में जाती हैं।