अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) अदालत ने पुलिस को उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की कथित फर्जी डिग्री की प्रारंभिक जांच करने का निर्देश दिया है। दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 156 (3) के तहत दायर एक आवेदन पर आदेश जारी किए गए हैं।

बुधवार को एसीजेएम (प्रयागराज) नम्रता सिंह ने छावनी, प्रयागराज के थाना प्रभारी को कुछ बिंदुओं पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया, जिसमें हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयागराज द्वारा उपमुख्यमंत्री को जारी उत्तर मध्यमा द्वितीय वर्ष की डिग्री की प्रामाणिकता शामिल है। मामले में आवेदक दिवाकर त्रिपाठी ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 156 (3) के तहत दायर एक याचिका में मौर्य के खिलाफ विभिन्न स्थानों से पांच चुनाव लडऩे के लिए फर्जी शैक्षणिक डिग्री के कथित उपयोग के लिए आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग की है। दूसरा, उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उपमुख्यमंत्री ने फर्जी डिग्री के आधार पर एक पेट्रोल पंप भी हासिल किया। एसीजेएम ने मामले की सुनवाई की अगली तारीख 25 अगस्त तय की है।

केशव प्रसाद मौर्य पर आरोप हैं कि उन्‍होंने साल 2012 में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान सिराथ विधानसभा सीट से और साल 2014 में फूलपुर लोकसभा सीट से नामांकन के दौरान हलफनामे में अपनी डिग्री बीए बताई है। इसमें बताया गया है कि उन्‍होंने हिंदी साहित्‍य सम्‍मेलन से साल 1997 में बीए किया है। लेकिन मामला इतना ही नहीं है, केशव प्रसाद मौर्य पर आरोप हैं कि उन्‍होंने अलग-अलग फर्जी डिग्रियों से अलग-अलग चुनाव लड़े हैं। साल 2017 में उन पर राजू तिवारी नाम के एक शख्‍स ने आरोप लगाया था कि मौर्य ने साल 2007 में प्रयागराज के पश्चिमी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ते समय हलफनामे में बताया था कि उन्‍होंने हिंदी साहित्‍य सम्‍मेलन से 1986 से प्रथमा, 1988 में मध्‍यमा और 1998 में उत्‍तमा की थी। प्रथमा की डिग्री को कुछ राज्‍यों में हाईस्‍कूल, मध्‍यमा को इंटर और उत्‍तमा को ग्रेजुएट के समकक्ष मान्‍यता दी जाती है।

इस बारे में शिकायत करने वाले शख्‍स राजू त‍िवारी का कहना था कि हिंदी साहित्‍य सम्‍मेलन बीए की डिग्री नहीं देता इसलिए हलफनामे में दी गई जानारी गलत है। और अगर वह उत्‍तमा को ही बीए की डिग्री बता रहे हैं तो दोनों के पास करने वाले साल अलग-अलग क्‍यों हैं। मतलब, 2007 के हलफनामे में उत्‍तीर्ण करने वाला साल 1998 लिखा है, जबकि साल 2012 और 2014 के चुनावी हलफनामे में यही 1997 लिखा गया है।