ऐसे मुजरिम जिन्हें मौत की सजा सुनाई जा चुकी है, उनमें से साठ फीसदी से ज्यादा ऐसे हैं, जिन्हें रात में अजीबो-गरीब आवाजें सुनाई देती हैं। वे कई बार खुदकुशी के बारे में सोच चुके हैं। दरअसल, राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय दिल्ली (National Law University) ने देश में मौत की सजा पाए 88 मुजरिमों पर करीब पांच वर्ष अध्ययन किया है। इनमें तीन महिलाएं भी हैं। इस अध्ययन में सामने आया है कि मौत की सजा (Death Penalty) पाए मुजरिमों में से 62 फीसदी किसी न किसी मानसिक रोग (mental illness) से पीड़ित हैं। यह अध्ययन में प्रोजेक्ट 39ए नाम से अपराध न्याय कार्यक्रम के तह किया गया है।

इसकी रिपोर्ट जारी करते हुए उड़ीसा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एस मुरलीधर ने कहा कि मौत की सजा (Death Penalty Research) से जुड़े सभी आयाम और समाज पर इसके असर को देखने की जरूरत है। अध्ययन के दौरान यानी पांच साल के दौरान इन 88 मुजरिमों (Death Penalty) में से 19 रिहा हो गए, हालांकि इनमें से 13 में मानसिक समस्याएं बनी रहीं। तीन ने आत्महत्या की कोशिश भी की। अध्ययन में 34 के आत्महत्या करने की आशंका जताई गई थी। अध्ययन में इन मुजरिमों के बैकग्राउंड का भी अध्ययन किया गया। इसमें पाया गया कि 88 मुजरिमों में 46 का बचपन शारीरिक व मौखिक शोषण में गुजरा। 64 ने उपेक्षापूर्ण जीवन जिया, 73 को अशांत पारिवारिक माहौल मिला।

अध्ययन में मिले नतीजे

- 62.2 फीसदी मुजरिम मानसिक बीमारी से ग्रस्त हैं

- 75 फीसदी की सोचने-समझने की क्षमता कम हो गई

- 50 फीसदी खुदकुशी के बारे में सोचते हैं

- 11 फीसदी अपनी बौद्धिक क्षमता खो चुके

- 35.3 फीसदी में गंभीर मानसिक समस्या से ग्रस्त हैं

- 22.6 फीसदी मानसिक बेचैनी से पीड़ित