कर्नाटक सरकार (karnataka governments) ने राज्य के सात जिलों में स्कूली बच्चों को अंडे (eggs to school children) का वितरण शुरू कर दिया है, जहां 1 दिसंबर से कुपोषण (Malnutrition in Karnataka) संकेतिक खतरे के रूप में सामने आया है। सरकार के इस फैसले ने समाज के एक वर्ग को नाराज कर दिया है जो मांग कर रहे हैं कि अंडे स्कूलों के अंदर वितरित नहीं किए जाने चाहिए क्योंकि यह स्कूल जाने वाले बच्चों में भेदभाव को प्रोत्साहित करता है।

स्कूली बच्चों को अंडे की खुराक का समर्थन करने वाले एक अन्य वर्ग का दावा है कि यह परियोजना बंद नहीं होनी चाहिए क्योंकि छात्रों को प्रोटीन सप्लीमेंट (protein supplement) की जरूरत होती है। जिन बच्चों की बेहतर पोषण तक आसान पहुंच होती है, उनके शिक्षा के परिणाम बेहतर होते हैं। 2007 में एच.डी. कुमारस्वामी (HD Kumaraswamy) ने धार्मिक समूहों के दबाव में आकर स्कूली बच्चों को अंडे बांटने की अपनी परियोजना को वापस ले लिया था। बहरहाल, यह देखना होगा कि अब भाजपा सरकार इस मुद्दे पर क्या प्रतिक्रिया देती है। शिक्षा मंत्री बी सी नागेश (Education Minister B C Nagesh) ने बताया कि लोगों ने इसका विरोध और समर्थन कर इस योजना को लागू किया है। उन्होंने कहा कि अंडे का कोई विकल्प नहीं है। सोयाबीन है, लेकिन बच्चे इसे नहीं खाएंगे। इस परियोजना को बच्चों में कुपोषण को दूर करने के इरादे से लागू किया गया है।

1 दिसंबर से, कर्नाटक सरकार (karnataka governments) ने सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ने वाले छह से 15 वर्ष की आयु के बच्चों और कुपोषण, एनीमिया और प्रोटीन की कमी से पीड़ित बच्चों को उबले अंडे और केले उपलब्ध कराना शुरू कर दिया है। इस योजना से बीदर, रायचूर, कालाबुरागी, यादगीर, कोप्पल, बल्लारी और विजयपुरा जिलों में पहली से आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले 14,44,322 छात्र लाभान्वित होंगे। कार्यक्रम मार्च 2022 में समाप्त होगा। यादगीर जिले में 74 प्रतिशत छात्र कुपोषण और एनीमिया से पीडि़त हैं। विजयपुरा में कलबुर्गी (72.4 फीसदी), बल्लारी (72.3 फीसदी), कोप्पल (70.7 फीसदी), रायचूर (70.6 फीसदी), बीदर (69.1 फीसदी) और 68 फीसदी छात्र कुपोषित पाए गए।

हालांकि सरकार के इस कदम का कड़ा विरोध हो रहा है। लिंगायत धर्म महासभा (Lingayat Dharma Mahasabha) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चन्ना बसवानंद स्वामीजी ने इस फैसले को वापस लेने की मांग की है। उन्होंने कहा कि स्कूल जाने वाले बच्चों के बीच ड्रेस कोड, पाठ्यक्रम में एकरूपता है। भोजन के मामले में भेदभाव नहीं होना चाहिए। सरकार को ऐसा भोजन उपलब्ध कराना चाहिए जो सभी को स्वीकार्य हो। उन्होंने कहा कि हम राज्य में मौजूदा कोविड की स्थिति को देखते हुए भविष्य की कार्रवाई पर चर्चा कर रहे हैं, और एक निर्णय लिया जाएगा। इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए पंद्रह संत एकत्र हुए हैं। विकास शिक्षाविद् और नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी के पूर्व फैकल्टी निरंजन आराध्या ने छात्रों को अंडे देने के विरोध को भोजन के आधार पर देश को बांटने की चाल बताया। 

उन्होंने कहा कि सरकार को धार्मिक धमकियों के आगे नहीं झुकना चाहिए। इस योजना को पूरे कर्नाटक में फैलाना होगा। मुझे नहीं पता कि धार्मिक संत इसमें क्यों शामिल हो रहे हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 5 वें दौर (2019) के अनुसार, कर्नाटक में, अधिकांश बच्चे स्टंटिंग के साथ अपनी आदर्श ऊंचाई और वजन तक नहीं पहुंच रहे हैं। यह पूछे जाने पर कि क्षेत्र में छात्रों को अंडे देना कितना महत्वपूर्ण है, यादगीर के जिला आयुक्त डॉ ने कहा कि अंडे ऊंचाई, वजन की परिधि में सुधार करते हैं, इन सभी मापदंडों में सुधार होता है। मेरे जिले (यादगीर) में मुझे अब तक विरोध नहीं दिखा है। हमारे कार्यालय में ऐसी मांग लेकर कोई नहीं आया है।