भारत ने नागरिकता (संशोधन) कानून के विरोध में पाकिस्तानी संसद द्वारा सोमवार को पारित किए गए प्रस्ताव को देश के आंतरिक मामलों में दखलंदाजी बताते हुए मंगलवार को खारिज कर दिया और कहा कि वह अपने यहां धार्मिक अल्पसंख्यकों के उत्पीडऩ से दुनिया का ध्यान भटकाने की बेकार कोशिश कर रहा है।


विदेश मंत्रालय ने यहां एक बयान में कहा कि पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेम्बली द्वारा पारित प्रस्ताव ऐसे मामलों के बारे में है जो पूरी तरह से भारत के आंतरिक विषय हैं। इसके माध्यम से पाकिस्तान द्वारा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के मुद्दे पर झूठ को और फैलाने तथा राज्य में पाकिस्तान के सतत समर्थन से जारी आतंकवादी गतिविधियों को जायज ठहराने की कोशिश की गयी है। भारत इसे सिरे से खारिज करता है।


उन्होंने कहा, 'हमें विश्वास है कि पाकिस्तान के ऐसे प्रयास नाकाम होंगे।' प्रस्ताव में नागरिकता संशोधन कानून 2019 के उद्देश्यों को जानबूझ कर गलत ढंग से उद्धृत किया गया है। यह कानून कुछ देश विशेष के धार्मिक उत्पीडऩ के शिकार नागरिकों को भारत की नागरिकता देता है। यह कानून किसी भी धर्म या समुदाय के भारतीय नागरिक की नागरिकता को समाप्त नहीं करता है। यह हास्यास्पद बात है कि पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेंबली ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरुद्ध भेदभाव वाला कानून बनाया है और वह यह आरोप लगाते हुए दूसरों पर उंगली उठा रही है।'


बयान में कहा गया कि राष्ट्रीय असेंबली के प्रस्ताव के माध्यम से पाकिस्तान ने अपने धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ दुव्र्यवहार एवं उत्पीडऩ से ध्यान भटकाने की नाकाम कोशिश की है। पाकिस्तान में हिन्दू, ईसाई, सिख एवं अन्य समुदायों की जनंसख्या के आंकड़े खुद ही सारी कहानी बयां कर रहे हैं।


बयान में भारत ने पाकिस्तान का आह्वान किया कि वह बजाय दूसरों पर वे आरोप लगाने की बजाय गंभीरता से आत्मचिंतन करे जिनका वह खुद दोषी है। पाकिस्तान को याद होगा कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहां सभी सरकारें निष्पक्ष एवं स्वतंत्र मतदान के माध्यम से चुनी गयी हैं और सभी भारतीयों को संविधान में बराबर अधिकार हैं, भले ही वे किसी भी धर्म को मानने वाले हों। पाकिस्तान को इन्हीं आदर्शों का पालन करना चाहिए।