यूक्रेन पर रूस के हमले बाद दुनिया के कई देशों ने रूस की निंदा की है लेकिन भारत रूस की आलोचना करने से बचता नजर आया है। यूक्रेन युद्ध में भारत के रुख को समझना आसान नहीं है। राजनयिक, सैन्य और ऊर्जा सहित कई कारणों से भारत सीधे तौर पर रूस की आलोचना करने से बच रहा है।

भारत लंबे वक्त से अपनी गुटनिरपेक्ष नीति के कारण किसी भी ब्लॉक के बेहद करीब जाने से बच रहा है। नई दिल्ली मॉस्को को अलग-थलग करने की जोखिम नहीं उठा सकती क्योंकि कश्मीर सहित किसी भी प्रतिकूल प्रस्ताव पर यूनाइटेड नेशंस में वीटो करने के लिए रूस पर भरोसा रहता है।

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1971 में बांग्लादेश को लेकर सोवियत संघ ने विवादित क्षेत्र से सैनिकों की वापसी की मांग वाले एक प्रस्ताव को वीटो कर दिया था। कुल मिलाकर रूस और उससे पहले सोवियत संघ ने भारत के पक्ष में छह बार वीटो का इस्तेमाल किया है। शीत युद्ध के बाद वीटो के लिए भारत को रूस पर बहुत अधिक निर्भर नहीं रहना पड़ा है लेकिन कश्मीर को लेकर आज की तारीख में भी तनाव बना हुआ है और ऐसे में साउथ ब्लॉक चाहता है कि क्रेमलिन उसके साथ रहे।

भारत और चीन के बीच बॉर्डर पर जारी विवाद को लेकर भारत को रूस से समर्थन या कम से कम तटस्थता की उम्मीद है। इससे भी महत्वपूर्ण बात ये कि भारत नहीं चाहता है कि रूस चीन का साथ दे और गलवान में हुए हिंसक झड़प के बाद तो भारत ऐसा कतई नहीं चाहता है।

हथियारों को लेकर भारत रूस पर निर्भर है। भारत के पारंपरिक हथियार के 60-70 फीसद रूसी मूल के हैं। पिछले एक दशक में भारत ने हथियारों में विविधता लाने की कोशिश की है लेकिन इस सबके बावजूद भारत रूस से दूर जाने की स्थिति में नहीं है। दोनों देशों के बीच सैन्य संबंध बढ़ते जा रहे हैं। दोनों देशों ने मिलकर ब्रह्मोस का उत्पादन किया है जिसे एयरक्राफ्ट, जहाजों और जमीन से दागा जा सकता है। हाल ही में भारत ने फिलिपींस को ब्रह्मोस मिसाइल निर्यात करना शुरू किया है।

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अमेरिका सहित अन्य पश्चिमी देशों भारत से हथियारों की टेक्नोलॉजी शेयर करने से बचते हैं लेकिन रूस के केस में ऐसा नहीं है। रूस ने भारत को अकुला श्रेणी की परमाणु पनडुब्बी पट्टे पर दी है। हाल ही में अमेरिकी विरोध के बाद भी भारत ने रूस से S-400 एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम की खरीद की है।

रक्षा इंडस्ट्री के साथ ही भारत का उर्जा क्षेत्र भी रूस के साथ अटूट रूप से जुड़ा हुआ है। हालंकि ऊर्जा उत्पादन के मामले में यह क्षेत्र बहुत बड़ा नहीं है लेकिन यह लगातार बढ़ रहा है और रूस एक प्रमुख भागीदार के तौर पर सामने आया है।

अमेरिका सहित पश्चिमी देश भारत के असैन्य परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निवेश नहीं कर रहे हैं लेकिन रूस ने भारत में छह परमाणु रिएक्टरों के निर्माण के लिए साइन किए हैं। रूस ने कहा है कि परमाणु दुर्घटना की स्थिति में अपना दायित्व ग्रहण करेगी लेकिन पश्चिमी देश ऐसी गारंटी देने को तैयार नहीं हैं। परमाणु ऊर्जा के साथ ही भारत ने रूसी तेल और गैस में भी निवेश किया है। भारत रूस के साथ मिलकर सखालिन द्वीप में सालों से जीवाश्म ईंधन निकालने में शामिल रहा है।