दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक समझौते RCEP यानि Regional Comprehensive Economic Partnership से भारत ने किनारा कर लिया है जिसके पीछे काफी चौंकाने वाली वजह है। चीन सहित एशिया-प्रशांत के 15 देशों ने दुनिया के इस सबसे बड़े इस व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। अमेरिका भी इस समझौते में शामिल नहीं है।

RCEP समझौता क्या है
RCEP पर 10 देशों के दक्षिणपूर्व एशियाई राष्ट्रों के संगठन (ASEAN) के वार्षिक शिखर सम्मेलन के समापन के बाद रविवार को वर्चुअल तरीके से हस्ताक्षर किए गए। यह समझौता करीब 8 साल तक चली बातचीत के बाद पूरा हुआ। इस समझौते के दायरे में करीब दुनिया की 30 फीसदी अर्थव्यवस्था आएगी।

RCEP एक व्यापार समझौता है, जो इसके सदस्य देशों के लिए एक-दूसरे के साथ व्यापार करने को बेहद आसान बनाता है। इसके सदस्य देशों को इंपोर्ट-एक्सपोर्ट पर लगने वाला टैक्स या तो भरना ही नहीं पड़ेगा या फिर बहुत कम देना पड़ेगा। इस समझौते के तहत भविष्य में सदस्य देशों के बीच व्यापार से जुड़े शुल्क घट जाएंगे। समझौते पर हस्ताक्षर के बाद सभी देशों को RCEP को दो साल के दौरान अनुमोदित करना होगा जिसके बाद यह लागू हो जाएगा।

अमेरिका भी RCEP में शामिल नहीं
सबसे पहले 2012 में RCEP का प्रस्ताव किया गया था। इसमें आसियन के 10 देश- इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिपीन, सिंगापुर, थाइलैंड, ब्रुनेई, वियतनाम, लाओस, म्यामांर और कंबोडिया के साथ चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं. अमेरिका इस समझौते में शामिल नहीं है।

भारत ने इसलिए किया RCEP से किनारा
भारत इस समझौते में शामिल नहीं हुआ इसके पीछे की वजहें हैं। इस समझौते से भारत के मेक इन इंडिया, आत्म निर्भर भारत जैसे मिशन को झटका लग सकता है और चीन को भी तवज्जो देनी पड़ सकती है—

1. जब व्यापार शुल्क खत्म हो जाएंगे तो देश में इंपोर्ट से बढ़ने लगेगा. जिससे लोकल मैन्यूफैक्चरर्स, कंपनियों को भारी नुकसान हो सकता है।
2. साल 2022 में ये लागू होगा, लेकिन कस्टम ड्यूटी का आधार 2014  होगा, जिससे भारत का मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्यूफैक्चरिंग को झटका लग सकता है।
3. एक्सपर्ट्स के मुताबिक अगर कोई देश RCEP के अलावा किसी दूसरे देश को अपने यहां निवेश करने पर अलग से कुछ फायदा देता है तो वही फायदा RCEP देशों को भी देना पड़ सकता है।
4. RCEP में चीन भी शामिल है, यानि भारत को मजबूरी में चीन को भी वो सभी लाभ देने पड़ते, जो कि भारत के लिए अब मुश्किल है।
5. किसान और व्यापारी संगठन इसका यह कहते हुए विरोध कर रहे थे कि अगर भारत इसमें शामिल हुआ तो पहले से परेशान किसान और छोटे व्यापारी तबाह हो जाएंगे।