माता-पिता के बीच विवाद होने के बाद बच्चा मां के साथ रह रहा है। पिता ने बच्चे को अपनी सुपुर्दगी में देने की मांग करते हुए कोर्ट में मामला प्रस्तुत किया था। कोर्ट ने मां के पक्ष में आदेश देते हुए आवेदन निरस्त कर दिया था। जस्टिस गौतम भादुरी की बेंच ने मां को बेटे के साथ उपस्थित होने के लिए कहा था। 

हाईकोर्ट ने बच्चे से पूछा कि क्या वह एडवोकेट बनना चाहता है? बच्चे ने जवाब दिया- नहीं। वहीं, बच्चे ने मां के साथ ही रहने की इच्छा जताई। हाईकोर्ट ने पिता की याचिका खारिज कर दी है। केंद्रीय विद्यालय मणिपुर में अंग्रेजी के पीजीटी और मूल रूप से दुर्ग निवासी वसंत कुमार सिंह की शादी विश्रामपुर में रहने वाली महिला के साथ फरवरी 2006 में हुई थी। 18 जनवरी 2007 को उनके बेटा हुआ।

महिला का आरोप है कि पति उनके साथ गलत व्यवहार करने लगे और मां- बेटे को घर से निकाल दिया। महिला ने पति सहित अन्य के खिलाफ विश्रामपुर में आईपीसी की धारा 498 ए के तहत प्रकरण दर्ज करवाया। मामला बाद में दुर्ग स्थानांतरित कर दिया गया। मां ने बच्चे के पालन- पोषण खर्च के रूप में प्रति माह दो हजार रुपए की मांग करते हुए आवेदन प्रस्तुत किया था। 

इधर, पिता ने बच्चे को अपनी सुपुर्दगी में सौंपने की मांग करते हुए कोर्ट में मामला प्रस्तुत किया। सूरजपुर के एडीजे की कोर्ट ने 3 दिसंबर 2014 को इसे निरस्त कर दिया था, लेकिन माह के पहले शनिवार को सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक किसी सार्वजनिक स्थान पर मिलने की छूट दी गई थी। आदेश के खिलाफ पिता ने उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका प्रस्तुत की थी। मामले पर जस्टिस गौतम भादुरी की बेंच में सुनवाई हुई। 

मां बेटे के साथ 10 अक्टूबर 2018 को कोर्ट पहुंची थी, इस दौरान कोर्ट ने दोस्ताना माहौल में बच्चे से कुछ सवाल किए। एक सवाल के जवाब में बच्चे ने कहा कि वह मां के साथ ही रहना चाहता है। साथ ही एक अन्य सवाल के जवाब में कहा कि वह एडवोकेट नहीं बनना चाहता। पिता के अकेले रहने, बच्चे की इच्छा सहित अन्य परिस्थितियों के आधार पर हाईकोर्ट ने बच्चे के बेहतर भविष्य का ध्यान रखते हुए मां को ही उसकी कस्टडी सौंपने का निर्णय लेते हुए याचिका खारिज कर दी है।