देश के तीसरे सबसे छोटे राज्य त्रिपुरा में भाजपा ने सबसे बड़ी जीत दर्ज की है। भाजपा गठबंधन ने वामदलों का 25 साल पुराना किला ध्वस्त कर पहली बार दो तिहाई बहुमत (43 सीटें) हासिल की हैं। पांच साल पहले 1.5 फीसदी वोट हासिल करने वाली भाजपा इस बार 43 प्रतिशत वोट और 35 सीटें जीत ले गई हैं। उसकी सहयोगी आईपीएफटी ने आठ सीटें जीती हैं। हालांकि इस जीत के बाद राजनीतिक विश्लेषक दावा कर रहे हैं कि अगर त्रिपुरा में लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस गठबंधन कर लेती तो वे भाजपा के इस विजयी रथ को रोक सकते थे। हालांकि अभी तक के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे विशेषज्ञों के दावे को खारिज करते हुए दिख रहे हैं।


दरअसल 60 सदस्यीय त्रिपुरा विधानसभा की 59 सीटों पर मतगणना के बाद तीन मार्च को परिणाम सामने आया। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को कुल 9 लाख 99 हजार 93 वोट मिले। वहीं लेफ्ट फ्रंट को 9 लाख 92 हजार 575 वोट मिले हैं। बीजेपी को लेफ्ट फ्रंट से 6 हजार पांच सौ 10 वोट ज्यादा मिले हैं। वहीं कांग्रेस को इस चुनाव में महज 41 हजार 325 वोट मिले। ऐसे में लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस का अगर गठबंधन होता तो वे भाजपा से आगे निकल जाते, लेकिन इस चुनाव में आईपीएफटी ने बीजेपी का साथ दिया और उसे 1 लाख 73 हजार 603 वोट मिले। लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस के वोटों को जोड़ा जाए तो यह दस लाख 33 हजार 900 के आंकड़े को छूता है। वहीं भाजपा और आईपीएफटी के वोट 11 लाख 72 हजार 696 के आकंड़े पर पहुंच जाते हैं। ऐसे में अगर लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस मिलकर भी भाजपा गठबंधन से 1 लाख 38 हजार 796 वोट से पीछे है।


वोट शेयर की बात करें तो भाजपा ने 51 सीटों पर चुनाव लड़ा और उसका वोट शेयर 43 फीसदी रहा। 9 सीटों पर चुनाव लडऩे वाली भाजपा की सहयोगी पार्टी आईपीएफट ने 7.5 फीसदी वोट पाए। 59 सीटों पर चुनाव लडऩे वाले लेफ्ट फ्रंट को  42.7 फीसदी वोट शेयर मिला। वहीं कांग्रेस का वोट शेयर दो फीसदी रहा। ऐसे में अगर लेफ्ट और कांग्रेस के वोट शेयर को जोड़ दिया जाता है तो यह कुल मिलाकर 44.7 फीसदी होता है। वहीं भाजपा और आईपीएफ गठबंधन का वोट शेयर 50.5 फीसदी है। इस तरह बीजेप गठबंधन 5.8 फीसद वोट शेयर से आगे निकल जाती है।