क्या निंदनीय न्यायेतर हत्याएं और मानवाधिकार हनन के अन्य गंभीर मामलों की जांच के लिए यह 'सच्चाई आयोग' बनाने का वक्त नहीं है? यह सवाल मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों के एक समूह ने मणिपुर विश्वविद्यालय में एक सम्मेलन के दौरान उठाया। उन्होंने इसका जवाब 'हां' में देते हुए अन्य समाधानों का भी सुझाव दिया।

सम्मेलन के आयोजकों ने एक बयान में कहा कि मणिपुर में न्यायेतर हत्या से पीड़ित परिवारों के लिए परिवर्ती न्याय (ट्रांजिशनल जस्टिस) की रूपरेखा के अनुप्रयोग पर परामर्श के लिए इस एक दिवसीय कार्यक्रम में पहुंचे हितधारकों ने पिछले कुछ दशकों से ऐसी हत्याओं से प्रभावित परिवारों की जरूरतों पर विचार-विमर्श किया। कार्यक्रम का अयोजन मणिपुर विश्वविद्यालय, ह्यूमैन राइट्स अलर्ट, एक्स्ट्राज्यूडिशियल एग्जिक्यूशन विक्टिम फैमिलीज एसोसिएशन, मणिपुर और ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी द्वारा किया गया था।

सम्मेलन में पहुंचे लोगों ने सच्चाई आयोग की तत्काल स्थापना करने, पीड़ितों को मुआवजे का भुगतान करने और प्रदेश मानावाधिकार संस्थानों समेत न्यायिक संस्थानों को मजबूत बनाने की जरूरत बताई।साथ ही, अपराधियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों से निबटने में शीघ्रता लाने और कानून व्यवस्था बनाए रखने में जिम्मेदारी सुनिश्चित करने के भी सुझाव दिए गए। मणिपुर मानवाधिकार आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष खडेम मणि ने केंद्रीय जांच ब्यूरो/विशेष जांच दल की जांच से निकले पीड़ितों के परिवारों को मुआवजा के लिए आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 375 एक के तहत राज्य सरकार के पास याचिका के लिए प्रोत्साहित किया और वहां विफल रहने पर एमएचआरसी के पास जाने को कहा। कार्यक्रम में मणिपुर मानवाधिकार आयोग, मणिपुर राज्य महिला आयोग और मणिपुर राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने हिस्सा लिया।