असम के तिनसुकिया के रहने वाले हिंदी भाषी दिनेश प्रजाापति आैर उनकी पत्नी को विदेशी बताकर डिटेंशन सेंटर में डाल दिया गया है। इस मामले के प्रकाश में आने के बाद  मामला तूल पकड़ने लगा है। जिससे हिंदी भाषी परेशान है। उन्हें भी अपनी नागरिकता को लेकर डर सताने लगा है।


बता दें कि असम के तिनुसुकिया में रहने वाले दिनेश प्रजापति आैर उनकी पत्नी तारा देवी को तीन महीने पहले विदेशी बताकर डिटेंशन सेंटर में डाल दिया गया था। प्रजापति दम्पत्ति का नाम भी एनआरसी में नहीं है। बेटे आैर बहू का विदेशी घोषित करने के बाद उनकी बूढ़ी मां ने 15 अगस्त को दम तोड़ दिया। अब प्रजापति दम्पत्ति के पांच बच्चे बेसहारा हो गए हैं आैर गांव वालों के पास हैं। भाजपा विधायक और हिन्दीभाषी समन्वय समित्ती के अध्यक्ष अशोकानंद सिंघल ने भी दिनेश प्रजापति और उन की पत्नी को विदेशी बताना और डिटेंशन कैम्प में डाल देने के मामले को अमानवीय करार दिया है।


एक स्थानीय समाचार पत्र से बात चीत के दाैरान उन्होंने कहा कि विदेशियों की पहचान के लिए  NRC एक सही प्रक्रिया जरूर है लेकिन NRC के नाम पर भारतीय नागरिक या हिंदी भाषी अगर परेशान होते हैं तो NRC पर प्रश्न चिन्ह लगना लाजमी है। उन्होंने कहा असम इस वक़्त कठिन समय से गुज़र रहा है इस लिए हर किसी को राजनीती से ऊपर उठ कर देश के लिए सोचना ज़रूरी है। उधर भाजपा प्रवक्ता प्रमोद स्वामी ने आरोप लगाया है कि दरअसल हिंदी भाषियों को विदेशी बता कर NRC प्रक्रिया को बाधित करने की साज़िश रची जा रही है।


सरकार को इस पूरे घटनाक्रम की गहराई से जांच करनी चाहिए और आरोप के खिलाफ सख्त कारवाई करनी चाहिए। NRC का काम बांग्लादेशियों की शिनाख्त के लिए किया गया, कुछ लोग इस प्रक्रिया को डाइवर्ट कर भारतीय नागरिकों को परेशान कर रहे हैं, जो लोग इस प्रक्रिया को बाधित कर भारतीय नागरिकों को परेशान कर रहे हैं, उन लोगों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाए।


दिनेश प्रजापती का मामला सुर्ख़ियों में आने के बाद हिंदी भाषियों को विदेशी बताने के और भी मामले सामने आने लगे हैं। इन्हीं मामलों में एक मामला गुवाहाटी के लाल बाबू पासवान का भी है।बिहार के पूर्वी चम्पारण से तीन दशक पहले रोटी के तलाश में आये लाल बाबू को भी विदेशी न्यायधिकरण की ओर से नोटिस मिला है और उन्हें विदेशी बताया गया है।


दिनेश प्रजापती की घटना सामने आने के बाद असम में रहने वाले हिंदी भाषी डरे-सहमे और परेशान से हैं। उन्हें यह आशंका सताने लगी है कि पता नहीं कब उन्हें विदेशी बना दिया जाए और अपने ही देश में नागरिकता साबित करने की नौबत आ जाए। परेशान हिन्दीभाषी अपने नेताओं के पास फरियाद ले कर पहुंच रहे हैं  लेकिन नेताओं के पास भी उन के फ़रियाद सुनने के आलावा और कोई दूसरा रास्ता नहीं है। वह उन की शिकायत केन्द्रीय नेताओं तक हुंचा रहे हैं। एक प्रकार से वह भी बेबस ही नज़र आ रहे हैं।