नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं इसके चलते देश के कई हिस्सों में इंटरनेट बंद कर दिया गया है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक इंटरनेट बैन करने के मामले में भारत दुनिया भर में सबसे आगे है। लेकिन क्या आपको पता है कि सरकार इंटरनेट बंद यानी उस पर बैन लगाने का फैसला कैसे लेती है और उसके किसकी मंजूरी लेनी होती है। इसके पीछे एक पूरी प्रकिया है जिसको फॉलो करते हुए इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाया जाता है। हम यहां आपको बता रहें हैं कि हमारे देश इंटरनेट कैसे और किसकी मंजूरी के बाद बंद किया जाता है। 

भारत में ऐसे लगता है इंटरनेट पर बैन

हमारे देश में केंद्र या राज्य के गृह सचिव इंटरनेट बैन करने का ओदश देते हैं। ये ओदश एसपी या उससे ऊपर के रैंक के अधिकारी के जरिए भेजा जाता है। इसके बाद वो अधिकारी इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स को इंटरनेट सर्विस ब्लॉक करने के लिए कहता है। इसके बाद आदेश को अगले कामकाजी दिन (वर्किंग डे) के भीतर केंद्र या राज्य सरकार के रिव्यू पैनल के पास भेजा जाता है। इस रिव्यू पैनल को 5 वर्किंग डेज में इसकी समीक्षा करनी होती है। केंद्र सरकार के रिव्यू पैनल में कैबिन सेक्रेटरी, लॉ सेक्रेटरी और टेलिकम्युनिकेशन्स सेक्रेटरी होते हैं। जबकि राज्य सरकारों में रिव्यू पैनल में चीफ सेक्रेटरी, लॉ सेक्रेटरी और एक कोई अन्य सेक्रेटरी शामिल होता है।

इमरजेंसी में कौन देता है इंटरनेट बैन का आदेश

इमरजेंसी के समय केंद्र या राज्य के गृह सचिव द्वारा अधिकृत किए गए जॉइंट सेक्रेटरी इंटरनेट बैन करने के लिए आदेश दे सकते हैं। हालांकि, इसके लिए उन्हें 24 घंटे के अंदर केंद्र या राज्य के गृह सचिव से इसकी मंजूरी लेना आवश्यक होता है। आपको बता दें कि 2017 से पहले जिले के कलेक्टर इंटरनेट बंद करने का आदेश देते थे। लेकिन 2017 में सरकार ने इंडियन टेलिग्राफ ऐक्ट 1885 के तहत टेम्प्ररी सस्पेंशन ऑफ टेलिकॉम सर्विसेज (पब्लिक इमरजेंसी या पब्लिक सेफ्टी) रूल्स बनाया जिसके बाद अब सिर्फ केंद्र या राज्य के गृह सचिव या उनके द्वारा अधिकृत अथॉरिटी ही इंटरनेट बंद करने के आदेश दे सकते हैं।

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