असम के डिब्रूगढ़ शहर के पास बोगीबील में ब्रह्मपुत्र नदी पर बने पुल को सुरक्षा रणनीति के नजरिए से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सुरक्षा जानकारों का मानना है कि ब्रह्मपुत्र के दोनों तरफ बसे लोगों की कनेक्टिविटी के अलावा असम के इस हिस्से को चीन की सीमा से सटे अरुणाचल प्रदेश से जोडऩा बेहद जरूरी था, ताकि बिना किसी दिक्कत के भारतीय फौज अपने सामान के साथ सीमावर्ती प्रदेश के आखिर छोर तक कम समय में पहुंच सके।


आपको बता दें कि पुल बनाने की मांग 1962 में चीनी आक्रमण के बाद उठी थी। चीनी आक्रमण के दौरान चीनी सेना असम के तेजपुर तक आ गई थी। उसने सरकारी कार्यालयों समेट स्टेट बैंक की शाखाओं में आग लगा दी थी। उस समय वहां का जिला प्रशासन ब्रह्मपुत्र के इस तरफ चला आया था। तभी यहां के लोगों ने ब्रह्मपुत्र पर पुल बनाने की मांग उठाई थी। यह कहना है डिब्रूगढ़ स्थित ईस्टर्न असम चैंबर ऑफ
कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष भूदेव फुकन का। बुरे फंसे मंत्री जी, अदालत ने जारी किया समन


साल 1965 में जब उस समय के केन्द्रीय कृषि मंत्री जगजीवन राम डिब्रूगढ़ के दौरे पर आए तो ईस्टर्न असम चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने ब्रह्मपुत्र पर पुल बनाने की मांग उठाई थी और उन्हें एक लिखित ज्ञापन भी सौंपा था। अब ये पुल भारतीय सेना के अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती हिस्सों में पहुंचने में मददगार साबित होगा। सैन्य सुरक्षा की रणनीति की समझ रखने वाले रूपक भट्टाचार्य कहते हैं कि ये एक रणनीतिक परियोजना थी। इस पुल के बनने से सेना की लामबंदी और फॉरवर्ड क्षेत्र में रक्षा आपूर्ति का काम आसान हो जाएगा क्योंकि बोगीबील पुल पर बनी सडक़ जब अरुणाचल प्रदेश की सडक़ों से जुड़ जाएगी तो सेना सीमा की अंतिम छोर तक कम समय में पहुंच पाएगी। पहले इसमें काफी वक्त लगता था।

अरुणाचल प्रदेश भाजपा के मुख्य प्रवक्ता डोमिनिक तादार का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा बोगीबील पुल का उद्घाटन चीन के लिए एक बड़ा जवाब होगा। इससे चीन का मुंह बंद होगा। अपने भारत के भीतर हम चाहे पुल बनाएं या फिर कोई अन्य विकास कार्य करें, उसमें चीन को बोलने का कोई हक नहीं है। इस पुल से भारतीय सेना की आवाजाही काफी सहज हो जाएगी। चीन का दावा रहा है कि अरुणाचल प्रदेश उसके क्षेत्र के अधीन है और उसे वो दक्षिणी तिब्बत के तौर पर पुकारता है।


आपको बता दें कि बोगीबील पुल के निर्माण से जुड़ी परियोजना 1997-98 में स्वीकृत हुई थी। इस परियोजना की आधारशिला तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने 22 जनवरी 1997 को रखी थी और इस परियोजना पर काम 21 अप्रेल 2002 को यानी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान शुरू किया गया। 5,900 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत से बनकर तैयार हुए बोगीबिल पुल के नीचे की तरफ से दो रेल लाइन बिछाई गई है और उसके ऊपर तीन लेन की सडक़ बनाई गई है, जिस पर भारी सैन्य टैंक आसानी से गुजर सकेंगे।


इस पुल के शुरू होने के साथ ही असम से अरुणाचल प्रदेश के बीच की यात्रा का समय चार घंटे कम हो जाएगा, जबकि दिल्ली से डिब्रूगढ़ के बीच ट्रेन यात्रा में तीन घंटे की कटौती होगी। इसके अलावा इस पुल की वजह से धेमाजी से डिब्रूगढ़ की दूरी महज 100 किलोमीटर रह जाएगी, जो सिर्फ 3 घंटे में पूरी की जा सकेगी, जबकि इससे पहले दोनों शहरों का फैसला 500 किलोमीटर का था, जिसे पूरा करने में 24 घंटे का वक्त लगता था। बोगीबील पुल परियोजना को साल 1985 में हुए असम समझौते की शर्तों का एक हिस्सा बताया जा रहा है।