होली का त्योहार कल मनाया जाएगा। इसी दिन शाम को गोधुलि वेला में होली का दहन किया जाएगा और दूसरे दिन मंगलवार को रंगोत्सव मनाया जाएगा। शास्त्रों के अनुसार फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन किया जाता है। दूसरे दिन नए मास यानी चैत्र मास की प्रतिपदा के दिन रंगोंत्सव मनाया जाता। इसे बसंत उत्सव के नाम से भी जाना जाता है।

ज्योतिषाचार्य पं. सुरेश शास्त्री के अनुसार होलिका दहन या पूजन भद्रा के मुख को त्याग करके करना शुभ फलदायक होता है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को प्रदोष काल में भद्रा रहित होलिका दहन करने का विधान है। सोमवार को भद्रा रहित प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा होने से होली का दहन इस दिन शाम को किया जाएगा। फाल्गुनी नक्षत्र, सिंहासन योग, बुधादित्य योग बन रहा है जो प्रजा के लिए शुभ रहेगा। साथ ही होली पर तीन ग्रहों का धनु राशि में विशेष संयोग भी बन रहा है। होलिका दहन सिंह लग्न में होने से अशुभ योग के फल का प्रभाव कम होगा। है। होलिका दहन के लिए गोधुलि वेला में शाम 6:28 से 6:53 बजे तक श्रेष्ठ मुहूर्त रहेगा। 

पं. राजकुमार शर्मा के अनुसार होलिका दहन के बाद जलती हुई होलिका के 3 चक्कर लगाने फिर इसमें हल्दी-कुमकुम अर्पित करने से विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती है। होलिका दहन से पहले स्नान करके हनुमान की उपासना करने और फिर होलिका दहन वाली जगह पर जाकर सरसों के तेल का दीपक जलाने से कर्ज मुक्ति मिलती है। यदि किसी को रोजगार पाने में परेशानी हो रही हो तो स्नान कर जलती हुई होलिका के 7 चक्कर लगाने और इसके बाद काले तिल और शक्कर होलिका को समर्पित करने से रोजगार प्राप्ति होती हैं।

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