पिछले दिनों ग्लास्गो जलवायु सम्मेलन में पीएम मोदी (PM modi) ने कहा था कि 2070 तक भारत शून्य कार्बन उत्सर्जन वाला देश बन जाएगा। उन्होंने कहा कि 2030 तक भारत अपनी जरूरत का 50 फीसदी उर्जा रिन्यूएबल सोर्स से उत्पन्न करेगी। ग्लोबल थिंक टैंक ‘ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन’ (ORF) की एक रिपोर्ट में यह कहा गया है कि भारत के शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन लक्ष्य की ओर बढ़ने के साथ 2050 तक देश की जीडीपी में 406 अरब डॉलर की वृद्धि होगी और 4।3 करोड़ से अधिक रोजगार अवसरों का सृजन होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में 2021 के जलवायु परिवर्तन सम्मेलन, सीओपी-26 में भारत के लिए 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन लक्ष्य की घोषणा की थी। साथ ही, भारत 2030 तक कम कार्बन उत्सर्जन वाली अपनी विद्युत क्षमता को 500 गीगावाट तक बढ़ाने और 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा से अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का 50 प्रतिशत पूरा करने का लक्ष्य बना रहा है। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के एक बयान में कहा गया है, ‘भारत का 2070 का शुद्ध-शून्य कार्बन उत्सर्जन लक्ष्य महत्वपूर्ण और सराहनीय है, लेकिन यह बेहद महत्वाकांक्षी भी है।” शेपिंग आवर ग्रीन फ्यूचर: पाथवे एंड पॉलिसी फॉर अ नेट-जीरो ट्रांसफॉर्मेशन’ रिपोर्ट में स्थिरता और विकास के दोहरे लक्ष्यों को संतुलित करते हुए इस बदलाव की ओर बढ़ने के लिए जरूरी संरचनात्मक परिवर्तन और गतिवर्धक कारकों के बारे में बताया गया है।

इधर ग्लासगो में संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन से इतर बुधवार को कुछ देशों और कंपनियों के समूह ने 2040 तक उत्सर्जन मुक्त कारों के लक्ष्य को हासिल करने की योजना की घोषणा की है। कनाडा, चिली, डेनमार्क, भारत, न्यूजीलैंड, पोलैंड, स्वीडन, तुर्की और ब्रिटेन आदि देशों ने इसका समर्थन किया। फोर्ड, जनरल मोटर्स, मर्सिडीज बेंज और वोल्वो कंपनियों और अमेरिका के कई राज्यों तथा शहरों ने भी इस योजना पर हस्ताक्षर किए। वोल्वो जैसी कुछ कंपनियां पहले ही कंबस्चन इंजनों को चरणबद्ध तरीके से उपयोग से बाहर करने के लक्ष्य तय कर चुकी हैं। कुछ देश इसी तरह के इंजन से चलने वाले ट्रकों और बसों के उपयोग को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का संकल्प ले रहे हैं।

भारत ने रविवार को संयुक्त राष्ट्र (United Nations) जलवायु शिखर सम्मेलन में कहा कि पिछले सात वर्ष में देश की सौर ऊर्जा क्षमता 17 गुना बढ़कर 45 हजार मेगावॉट हो गई है। भारत ने जोर देते हुआ कहा कि वैश्विक आबादी में उसका हिस्सा 17 फीसदी और इसके बावजूद उसका कुल उत्सर्जन में हिस्सा केवल चार फीसदी है।