राज्यवासी बांग्लादेशियों की समस्या को लेकर पिछले कुछ वर्षों से केंद्र एवं राज्य सरकार की विभीन्न गतिविधियों का गवाह बने हुए हैं। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल की उपस्थिति में राज्य मंत्रिमंडल के सदस्य तपन गोगोई एवं अखिल असम छात्र संघ (आसू ) ने संयुक्त तौर पर असम समझौते के मामले में केंद्र सरकार को एक ज्ञापन सौंपा था ।

 इसी मुद्दे  को लेकर सरकार ने वर्ष 2017 के 30 अप्रैल को एक कमेटी का गठन किया था, जो आज तक केवल कागजी दस्तावेजों में ही सिमटी हुई है । इस कमेटी को पुन: चालू करने के लिए आज तक सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया है । आसू के मुख्य सलाहकार डॉ. समुज्ज्वल भटूटाचार्यं ने कहा कि इसी से यह साफ प्रमाणित होता है कि सरकार कितनी हद तक असम की विदेशी समस्या को लेकर सगज है । 

उन्होंने बताया कि पुरानी कमेटी को सरकार पुन: चालू करने के बजाए अब एक नई उच्चस्तरीय कमेटी का गठन का निर्णय ले रही है । इसका मतलब यह है कि काम तो कुछ हुआ नहीं, परंतु कमेटी पर कमेटी बनाई जा रही है। उन्होंने आगे यह भी बताया कि सरकार अब किसी भी प्रकार की जिम्मेवारी का बोझ अपने सर पर लेने को तैयार नहीं है, क्योंकि अपनी असफलता को ढंकने के लिए सरकार कमेटियों का सहारा ले रही है । 

इस मामले पर उन्होंने आगे बताया कि केंद्र व असम सरकार, आसू व गण संग्राम परिषद त्रिपक्षीय समझौते में बंधे हुए हैं जिसे लेकर नई दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के साथ हम कई बार चर्चा कर चुके है । अब केंद्र हो या राज्य सरकार वे सीमा सील, राज्यिक सुरक्षा आदि जैसे गंभीर मामलों में कमेटियों पर ही संपूर्ण जिम्मेदारी थोपने की होड़ लगी रही है, जबकि मोदी सरकार के साढ़े चार साल के शासनकाल में प्रधानमंत्री ने इस पर अपनी तरफ से किसी भी प्रकार की टिप्पणी नहीं की है ।