म्यांमार में हिन्दू कब्रों के मिलने की खबरों को लेकर सरकार ने आज चुप्पी तोड़ते हुए अपना पक्ष रखा, लेकिन तीन अक्टूबर को राजनयिकों द्वारा घटनास्थल के दौरे में भारतीय अधिकारियों के शामिल होने को लेकर रुख स्पष्ट नहीं किया। 

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने यहां संवाददाताओं से कहा कि हमने उन कब्रों के बारे में प्रेस रिपोर्ट देखीं हैं और हमने म्यांमार के स्टेट काउंसलर के कार्यालय द्वारा जारी बयान को भी देखा है। उन्होंने कहा कि भारत आतंकवाद के हर स्वरूप की निंदा करता है और आतंकवाद की किसी भी घटना को किसी भी बहाने से जायज नहीं ठहराया जा सकता है। 

उन्होंने कहा कि इस संघर्ष की स्थिति में हमें उम्मीद है कि सरकार इस हमले के दोषियों को कानून के शिकंजे में लाएगी। उन्होंने यह उम्मीद भी जताई कि पीड़तिों को हरसंभव मदद दी जाएगी ताकि उनमें सुरक्षा की भावना बहाल हो सके और स्थिति सामान्य हो सके। संवाददाताओं के सवालों के जवाब में प्रवक्ता ने कहा कि भारत इस बात से अवगत है कि म्यांमार सरकार ने राजनयिकों को हिंसा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने का निमंत्रण दिया है। इन राजनयिकों में भारतीय अधिकारियों के शामिल होने अथवा नहीं होने के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि उनकी जानकारी के अनुसार देश के कुछ मीडिया कर्मी भी जाएंगे। लेकिन भारत सरकार की भागीदारी को लेकर वह अनभिज्ञ हैं। 

म्यांमार से आने वाली मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि हिंसा प्रभावित रखाइन प्रांत में 28 हिंदुओं की सामूहिक कब्र मिली है। इन कब्रों को ढूंढने वाली म्यांमार सेना ने इसके पीछे म्यांमार विद्रोहियों को दोषी ठहराया है। वहां के सेना प्रमुख की वेबसाइट पर जारी बयान के मुताबिक, सुरक्षा बलों को 28 हिंदुओं के शव बरामद हुए हैं, जिन्हें एआरएसए (अराकन रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी) ने बहुत ही क्रूरता के साथ मारा है। रोहिंग्या के मुद्दे और म्यांमार एवं बंगलादेश के बीच भारत की ओर से मध्यस्थता की संभावना के बारे में पूछे जाने पर प्रवक्ता ने कहा कि हम म्यांमार की सीमा से आने वाले लोगों को ऑपरेशन इंसानियत के तहत मानवीय सहायता पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। दोनों देश इस स्थिति के बारे में एक दूसरे के संपर्क में हैं। हम बंगलादेश को इस स्थिति से निपटने में पूरी सहायता देने को प्रतिबद्ध हैं।