गुवाहाटी हाईकोर्ट ने विदेशियों के ट्रिब्यूनल की कार्य-पद्धति पर सख्त ऐतराज जताया है। हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा है कि सामान्य तौर पर फॉरेन ट्रिब्यूनल के पूर्व सदस्यों के खिलाफ आदेशों में विसंगतियों को लेकर की गई कार्रवाई को अनुशासनात्मक या कुछ और कहा जा सकता है। गौरतलब है कि एनआरसी से हटाए गए 19 लाख लोगों की किस्मत अधर में है। राज्य के फॉरेन ट्रिब्यूनल द्वारा उन्हें बाहर करने के बाद उनको नागरिक रजिस्टर (NRC) में जगह नहीं मिली।

फिलहाल, असम में 10 फॉरेन ट्रिब्यूनल हैं और 200 नए अभी स्थापित किए जा रहे हैं। गुवाहाटी हाईकोर्ट ने 288 मामलों की जांच करते हुए पाया कि 57 मामले में “विसंगतियां” शामिल थीं। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि असम सरकार और उसके गृह और राजनीतिक विभाग के उप सचिव की एक रिपोर्ट के मुताबिक 57 मामलों में विसंगतियों का पता लगाया गया था।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में इसके पीछे कुछ कारणों को भी गिनाया है। उसके मुताबिक, 11 मामलों में फैसले का रिकॉर्ड नहीं मिला। जबकि, 6 मामले में फैसले की प्रतियां और ऑर्डर शीट के बीच कोई मेल ही नहीं था। इनमें से तीन के रिपोर्ट में कहा गया, “नोट शीट में कार्यवाह आगे बढ़ाने वाले को भारतीय घोषित किया गया, लेकिन विचार में उसे विदेशी करार दे दिया गया।”

पांच मामलों के रिपोर्ट में दोहरे निर्णय पाए गए। वहीं, रिपोर्ट में पाया गया कि 32 मामलों में व्यक्तियों को एक तरफा निर्णय में विदेशी घोषित किया गया। लेकिन, उसके बाद बिना पुराने आदेश को बदले उन्हें भारतीय घोषित कर दिया गया। दो मामलों में नामों में विसंगतियां और गलतियां चिन्हित की गईं। एक मामला तो इसलिए अधूरा छोड़ दिया गया, क्योंकि उसमें कथित संदिग्ध विदेशी की मौत हो गई।

फॉरेन ट्रिब्यूनल और गुवाहाटी हाईकोर्ट में कई संदिग्ध “विदेशियों” का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील अमन वदूद ने कहा, “यह फॉरेन ट्रिब्यूनल सदस्यों की योग्यता पर गंभीर सवाल उठाता है। आने वाले लोगों और उनकी पीढ़ियों के भाग्य का फैसला करने से पहले उन्हें कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं मिलता है। उन्हें बस कुछ दिनों का ओरिएंटेशन मिलता है। भारत में कई शानदार न्यायिक अकादमियां हैं, वहां से उन्हें ट्रेनिंग दिलाने में सरकार को क्या चीजें रोक रही हैं?”