अक्सर हमने गिलहरियों को अपने जमीन से पेड़ पर उछलते-कूदते देखा है। यह जीव अमूमन सभी जगह देखने को मिल जाएगा। इन गिलहरियों की विश्व में तीन प्रजातियां पाई जाती हैं। हाल ही में ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने हिलालय में ऐसी ही एक विशालकाय गिलहरी को खोजा है जो बेहद दुर्लभ और विलुप्तप्राय प्रजातियों में से एक है। इस गिलहरी का वजन करीब ढाई किलो है और लंबाई एक मीटर है। 

आमतौर पर गिलहरियां न तो इतनी वजनदार और न ही इतनी लंबी होती हैं। इस तरह की गिलहरियां दुनिया की कुछ सबसे ऊंची पहाड़ियों पर मिलती हैं। खास तौर पर एशिया में हिमालय की पहाड़ियों  पर इनका डेरा है। वैज्ञानिकों को 130 साल बाद इस प्रजाति की गिलहरी मिली है। उडऩे वाली गिलहरी भारत के अलावा रूस, चीन, श्रीलंका, जापान और एशिया के अधिकांश भागों, अफ्रीका के घाना, कांगो और उत्तरी अमेरिका के कुछ भागों में पाई जाती है। इसका आकार बिल्ली के बराबर तक होता है।

ऑस्ट्रेलियन म्यूजियम के चीफ साइंटिस्ट प्रोफेसर क्रिस्टोफर हेलगन कहते हैं कि इसको साल के अंत तक ही इस गिलहरी की प्रजाति को कोई वैज्ञानिक नाम दिया जा सकेगा। ये दुनिया की कुछ सबसे विशालकाय गिलहरियों में से एक है। इन गिलहरियों के रोएं सॉफ्ट हैं और ये काफी खूबसूरत हैं। यही चीज उन्हें दूसरों से अलग बताती है। इनकी किसी भेडि़ए की तरह बड़ी और रोएंदार है। इन्हें ऊंची जगहों पर रहना पसंद है। डॉक्टर जैक्सन कहते हैं कि ये गिलहरियां करीब 4800 मीटर की ऊंचाई पर रहती हैं, जो एवरेस्ट की आधी है। ऐसे में कहा जा सकता है कि इन्हें आबादी के बीच रहना पसंद नहीं। उडऩे वाली ये गिलहरियां असल में उड़ती नहीं बल्कि हवा में ग्‍लाइड करती हैं। मतलब ये पंछियों की तरह हवा में ऊपर की ओर नहीं उड़ती बल्कि ये एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर ग्‍लाइड लगाती हैं। ग्‍लाइड करते समय से दिशा बदल सकती हैं।