असम के पूर्व मुख्यमंत्री एवं असम गण परिषद (अगप) के अध्यक्ष प्रफुल्ल कुमार महंत ने नागरिकता (संशोधन) विधेयक के खिलाफ विरोध को लेकर गुरुवार को मतदान नहीं किया।  महंत की पार्टी राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी है और भाजपा ने कहा है कि अगर उसकी केन्द्र में दोबारा सरकार बनती है तो नागरिकता (संशोधन) विधेयक -2016 को संसद में पेश करके कानूनी जामा पहनाये जाने की दिशा में काम किया जायेगा। 

दो बार मुख्यमंत्री रह चुके महंत ने यहां स्थानीय टेलीविजन चैनलों से कहा कि उन्होंने सोच -समझ कर इस बार मतदान नहीं करने का फैसला किया। अगर वह मतदान करते तो इसका मतलब होता कि वह इस विधेयक का समर्थन कर रहे हैं। उन्होंने कहा, मैं इस बात पर कायम हूं कि यह विधेयक अगर कानून बन गया तो असम के लोगों की पहचान को खत्म कर देगा। मैं ऐसी किसी पार्टी अथवा व्यक्ति को वोट नहीं दे सकता जो सीधे तौर पर इस विधेयक को कानून बनाने में मदद करेगी।

महंत की पत्नी एवं पूर्व राज्य सभा सांसद जयश्री महंत ने भी नागरिकता (संशोधन) विधेयक के विरोध में मतदान नहीं किया। भाजपा ने जब इस विधेयक को लोकसभा में पेश करने का निर्णय लिया तो एजीपी जनवरी में गठबंध से अलग हो गयी थी, लेकिन बाद में मार्च वह गठबंधन में लौट आयी। उसने कहा था कि कांग्रेस को हराने के लिए उसकी गठबंधन में वापसी हुयी। उसने यह भी कहा था कि नागरिकता (संशोधन) विधेयक राज्य सभा में पेश नहीं हुआ इसलिए वह समाप्त होग गया। नागरिकता अधिनियम, 1955 में संशोधन के लिए लोकसभा में यह विधेयक पेश किया गया। 

विधेयक में अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बंगलादेश से अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को भारत में 12 साल की जगह सात वर्ष निवास करने के बाद ही नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान है। ऐसे लोगों के पास कोई उचित दस्तावेज नहीं होने पर भी उन्हें नागरिकता दी जा सकेगी। अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोग अल्पसंख्यक हैं। पूर्वोत्तर में लोगों का एक बड़ा तबका और कई संगठन इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं।