किसान आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। सुप्रीम कोर्ट में अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि उनमें से कोई भी फेस मास्क नहीं पहनता है, वे बड़ी संख्या में एक साथ बैठते हैं। कोविड-19 एक चिंता का विषय है, वे गांव जाएंगे और वहां कोरोना फैलाएंगे। किसान दूसरों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकते। CJI का कहना है कि किसानों को बड़ी संख्या में दिल्ली में प्रवेश करने की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं, यह पुलिस का फैसला होगा, न अदालत का और न कि सरकार का जिसका आप विरोध कर रहे हैं। CJI ने कहा कि हम सब पक्षकारों को सुनने के बाद ही आदेश जारी करेंगे। कोर्ट ने कहा कि हम किसान संगठनों को सुन कर आदेश जारी करेंगे। वैकेशन बेंच में मामले की सुनवाई होगी। SG ने कहा कि शनिवार को मामले की सुनवाई कर लें।

गौरतलब है कि देश की राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर डटे किसानों का आंदोलन गुरुवार को 22वें दिन जारी है। किसान केंद्र सरकार द्वारा लागू तीन नये कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। प्रदर्शनकारी किसान संगठनों के नेता कहते हैं कि जब तक सरकार उनकी मांगें नहीं मानेगी तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।  पंजाब में भारतीय किसान यूनियन (लाखोवाल) के जनरल सेक्रेटरी हरिंदर सिंह लाखोवाल ने कहा कि आज (गुरुवार) किसान संगठनों के नेताओं की फिर बैठक होने जा रही है जिसमें आंदोलन को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सुझावों समेत आगे की रणनीति पर विचार-विमर्श किया जाएगा।

केंद्र सरकार द्वारा लागू जिन तीन नये कानूनों को किसान संगठनों के नेता निरस्त करवाने की मांग कर रहे हैं। उनमें कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) कानून 2020, कृषक (सशक्तीकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार कानून 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून 2020 शामिल हैं। हालांकि किसानों की मांगों की फेहरिस्त लंबी है। किसान संगठनों के नेता न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर सारी अधिसूचित फसलों की खरीद की गारंटी के लिए नया कानून बनाने की मांग भी कर रहे हैं जबकि सरकार ने एमएसपी पर फसलों की खरीद की मौजूदा व्यवस्था जारी रखने के लिए लिखित तौर पर आश्वासन देने की बात कही है।

इसके अलावा, उनकी मांगों में पराली दहन से जुड़े अध्यादेश में कठोर दंड और जुर्माने के प्रावधानों को समाप्त करने और बिजली (संशोधन) विधेयक को वापस लेने की मांग भी शामिल है। बता दें कि सरकार ने नये कृषि कानूनों में संशोधन करने और किसानों की अन्य मांगों पर विचार करने के आश्वासन के साथ किसानों को नौ दिसंबर को ही प्रस्ताव भेजा था जिसे प्रदर्शनकारी किसान संगठनों ने नकार दिया था। उसके बाद से सरकार की ओर से लगातार कहा जा रहा है कि किसान संगठनों के नेताओं से सरकार किसानों के मसले पर बातचीत के लिए हमेशा तैयार है। मगर, किसान नेताओं का कहना है कि सरकार के जिस प्रस्ताव को उन्होंने ठुकरा दिया है उस पर बातचीत नहीं हो सकती है।