भारत व चीन के सीमाओं को लेकर सालों से चल रहा विवाद दोनों देशों के मुखियों के बीच सिर्फ चर्चा करने से हल नहीं होगा। मुद्दा चाहे डोकलाम विवाद का हो, अरुणाचल प्रदेश या लद्दाख सीमा का, जब तक दोनों देशों के बीच अर्थपूर्ण वार्ता नहीं होगी, तब तक किसी भी मुद्दे के परिणाम के बारे में सोचना सही नहीं होगा, क्योंकि चीन की पहले से ही मानसिकता रही है कि वे हर बार आश्वासन मात्र देकर बाद में अपनी बात से मुकर जाता है। निर्वासित तिब्बत संसद के उप-सभापति आचार्य यशी फुंचुक ने एक बयान में कहा कि जब दोनों की देशों की सीमा विवाद तिब्बत मसले के हल होने के बाद ही सुलझ पाएंगे।

अपने आपको विश्व से सबसे संपन्न राष्ट्र मानने वाले चीन को भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली से सीखना चाहिए, जबकि नागरिकों को स्वायतता, धर्म, संस्कृति आदि सभी अधिकार दिए हैं, लेकिन चीन की लोकतांत्रिक प्रणाली में ऐसा देखने को भी नहीं मिलता है। उन्होंने कहा कि चेन्नई में होने वाले द्वितीय सामान्य शिखर सम्मेलन में राष्ट्रीय मुद्दों पर गहनता से चर्चा की जानी चाहिए तभी वर्तमान में तिब्बत एवं सीमा विवादों की समस्या का समाधान हो सकेगा।

यशी फुंचुक का कहना है कि 2014 से लेकर 2018 तक भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व चीन राष्ट्रपति शी-चिनि‍फंग के बीच कई बार मुलाकात हुई लेकिन विवादों की समस्या का कोई समाधान नहीं निकला। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति के बीच पिछले साल चीन के वुहान में भी एक सम्मेलन में मुलाकात हुई थी। यह शिखर मुलाकात बिना किसी एजेंडे के हुई थी जिसमें कई मसलों पर चर्चा हुई थी। इस बैठक को लेकर कहा गया कि इसमें कोई एक स्थायी एजेंडा नहीं था, हर मुद्दे पर कुछ न कुछ चर्चा की गई। तब इस बात का भी जिक्र किया गया था कि इस तरह की सम्मेलन भविष्य में भी जारी रहेंगे।