दुनिया में कई ऐसे भयानक मेडिकल एक्सपेरिमेंट्स हुए हैं इंसानियत को तार-तार करने वाले रहे हैं। ये एक्सपरीमेंट्स कुछ वैज्ञानिकों के पागलपन का नतीजा थे, तो कुछ तानाशाहों और शासकों की खुराफात थी। कभी-कभी विज्ञान के कुछ प्रयोग इतने खतरनाक हो जाते हैं कि वो अपराध की श्रेणी में आ जाते हैं। हम आपको ऐसे ही कुछ एक्सपीमेंट्स के बारे में बता रहे जिनके बारे में सुनकर ही लोगों की रूह कांप जाती है।

नाजी सेना मेडिकल एक्सपेरिमेंट्स
यह दुनिया का सबसे भयावह मेडिकल एक्सपेरिमेंट था। इसे होलोकास्ट के दौरान ऑशविट्ज में एसएस फिजिशियन डॉ. जोसेफ मेंगेल ने किया था। वह ट्रेन से कैंप में आने वाले जुड़वा और अन्य लोगों पर एक्सपेरिमेंट कर रहा था। वह यह देखना चाहता था कि आर्य कैसे अन्य नस्लों से बेहतर है। इस प्रक्रिया में कई लोग मारे गए।

एकसाथ पैदा हुए 3 बच्चों को अलग करना
1960 और 70 के दशक की यह बात है जब पीटर न्यूबॉएर और वायोला बर्नाड ने कई क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट के साथ मिलकर जुड़वा और तिड़वा को अलग करके सिंगल आइडेंटिटी के रूप में देखते थे। इस एक्सपेरिमेंट को आंशिक रूप से नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ ने फंडिंग की थी। इस छिपे हुए एक्सपेरिमेंट के बारे में तब पता चला जब ट्रिपलेट्स 1980 में अचानक कहीं मिल गए। उन्हें कोई आइडिया नहीं था कि वो तीनों भाई-बहन हैं। इनमें से एक भाई डेविड केलमैन ने कहा कि हमें प्रयोग के नाम पर धोखा दिया गया। नहीं तो 20 साल पहले से एकसाथ होते। डेविड के भाई एडवर्ड गैलैंड ने 1995 में खुदकुशी कर ली। पीटर न्यूबॉएर की स्टडी 1996 में नेचर थंबप्रिंटः द न्यू जेनेटिक्स ऑफ पर्सनैलिटी में छपी थी।

जापान का यूनिट 731 एक्सपरीमेंट
1930 से 40 के बीच जापानी इंपीरियल सेना ने बायोलॉजिककल हथियारों के परीक्षण के लिए आम लोगों को चुना था जो कि चीन के थे। ये परीक्षण जापानी सेना के जनरल शिरो इशी के नेतृत्व में हो रहे थे। शिरो इसी यूनिट 731 का मुख्य फिजिशियन था। ऐसा माना जाता है कि इस एक्सपेरिमेंट करीब 2 लाख लोग मारे गए।

द मॉन्स्टर स्टडी एक्सपरीमेंट
1939 में यूनिवर्सिटी ऑफ आयोवा (University of Iowa) के रिसर्चर्स ने थ्योरी दी की हकलाना एक सीखा हुआ व्यवहार है. जो बच्चे तनाव या बेचैनी में करते हैं। शोधकर्ताओं ने यह बात प्रमाणित करने के लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण तरीका अख्तियार किया। उन्होंने अनाथ बच्चों को यह कहना शुरु किया कि वो कुछ दिन बाद हकलाना शुरु कर देंगे। ओहियो सोल्जर्स एंड सेलर्स ऑर्फन्स में बैठकर शोधकर्ता बच्चों के साथ उन्हें हकलाने से संबंधित लक्षणों के बारे में बताते थे। हालांकि इस एक्सपेरिमेंट से किसी बच्चे ने हकलाना शुरु नहीं किया। लेकिन इससे बच्चे अकेलापन, अलग-थलग, बेचैन और शांत रहने लगे। न्यूयॉर्क टाइम्स ने 2003 में आर्टिकल प्रकाशित किया जिसमें इस स्टडी को द मॉन्स्टर स्टडी नाम दिया. इस स्टडी में बचे तीन बच्चों ने साल 2007 में आयोवा प्रशासन और यूनिवर्सिटी पर केस कर दिया।

द टस्कीगी स्टडी
मेडिकल एथिक्स यानी चिकित्सा संबंधी नैतिकता पूर्ण नियमों को सबसे ज्यादा अमेरिका में तब अनदेखा किया गया जब एक एक्सपेरिमेंट 40 सालों तक चला। इसका नाम था द टस्कीगी स्टडी। 1932 में सेंटर्स फॉर डिजीस कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने यह स्टडी लॉन्च की थी ताकि काले लोगों पर सिफलिस के असर की जांच की जा सके। शोधकर्ताओं ने अलबामा में 399 ब्लैक लोगों और 201 स्वस्थ लोगों पर प्रयोग किया। उन्हें बताया गया था कि उनका खून गंदा है। हालांकि प्रयोग में शामिल लोगों को कभी भी सही दवाई या इलाज नहीं दिया गया। 1947 में पेंसिलीन को सिफलिस के इलाज के लिए उपयोग में लाया जाने लगा, तब भी इन लोगों को दवा नहीं दी गई। 1972 में एक अखबार ने इस स्कैंडल का खुलासा किया। जिसके बाद यह प्रयोग बंद हुआ।