दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप) के मुद्दे पर मंगलवार को कहा कि अगर औरत ना कहती है, तो यह अपराध है। ऐसे रिश्ते अलग मुकाम पर नहीं जा सकते हैं। कोर्ट ने सवाल किया कि एक अविवाहित महिला के रूप में एक विवाहित महिला की गरिमा कैसे प्रभावित नहीं होती है जब पुरुष खुद को उस पर थोपता है। 

Marital rape that if a woman says no, then it is a crime

कोर्ट ने कहा कि ऐसे में रिश्ते एक अलग मुकाम पर नहीं जा सकते हैं क्योंकि एक महिला एक महिला रहती है। कोर्ट की यह टिप्पणी उस समय आई जब मंगलवार को जस्टिस राजीव शकधर और सी हरिशंकर की खंडपीठ वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।

जस्टिस राजीव शकधर ने दिल्ली सरकार की वकील नंदिता राव से पूछा कि यह एक अविवाहित महिला की गरिमा को प्रभावित क्यों करती है जबकि एक विवाहित महिला की गरिमा को प्रभावित नहीं करती है। जस्टिस शकधर का यह सवाल तब आया जब दिल्ली सरकार के वकील ने अदालत को सूचित किया कि विवाहित महिलाएं आईपीसी की धारा 498 ए के तहत इलाज की मांग कर सकती है। दिल्ली सरकार के वकील ने अदालत को यह भी बताया कि आज की स्थिति में पति-पत्नी द्वारा आईपीसी की धारा 377, 498ए और 326 के तहत प्राथमिकी दर्ज की जाती है।

अदालत ने पूछा कि ऐसा क्यों है जब एक पुरुष महिला की रजमंदी के बगैर जबरदस्ती करता है तो एक अविवाहित महिला की गरिमा को प्रभावित करता है लेकिन एक विवाहित महिला की गरिमा को प्रभावित नहीं करता है। इसके साथ-साथ अदालत ने यह कहते हुए उदाहरण भी रखा कि कल्पना कीजिए कि एक महिला को मासिक धर्म हो रहा है, पति कहता है कि वह सेक्स करना चाहता और उसके साथ क्रूरता करता है। इसके जवाब में दिल्ली सरकार के वकील ने कहा कि यह एक अपराध है लेकिन आईपीसी की धारा 375 के तहत नहीं।