कुछ करने की ठान ली जाए तो एक ना एक दिन सफलता जरूर मिलती है। ऐसी ही कहानी है गुजरात के राजकोट की दीपा दवे की। दीपा मणिपुर के इंफाल के गांव सुफो बैलो में बच्चों को पढ़ाती हैं। इतना ही नहीं उन्होंने 68 उग्रवादियों को  मुख्यधारा में भी लाने का काम किया। हालांकि इन सबके बीच उन्हें 18 साल तक संघर्ष करना पड़ा।


दीपा बताती हैं कि 2003 में वह यहां आर्ट ऑफ  लिविंग की ओर से खोले गए स्कूल में शिक्षिका के तौर पर आई थीं। तब मणिपुर के इस इलाके में उग्रवाद चरम पर था। 2003 जनवरी में स्कूल की नींव रखने के साथ ही उग्रवादियों का उन तक संदेश आ गया। वे चाहते थे कि दीपा स्कूल बंद करके वापस चली जाएं। उग्रवादियों के पहले संदेश को उन्होंने नजरअंदाज कर दिया। उग्रवादियों को यह बात पसंद नहीं आई और अगले दिन कुछ हथियारबंद लोग उनके पास आ धमके। उनके पास एके-47 तक थी। उग्रवादियों ने उन्हें वापस लौटने के लिए एक माह का समय दिया। मगर वह फिर भी नहीं लौटीं।


 कुछ समय बाद कुकी उग्रवादियों के एक गुट ने स्कूल चलाने के एवज में उनसे पैसों की डिमांड शुरू कर दी। दीपा ने यह मांग भी ठुकरा दी और खुद उग्रवादियों से बात करने का फैसला किया।  इसके लिए उन्होंने स्थानीय आदिवासियों से मदद ली और कुछ कुकी उग्रवादियों के घर जाकर उनसे मिलीं। पहली मुलाकात में उन्हें सफलता नहीं मिली। मगर उन्होंने मुलाकात का सिलसिला नहीं छोड़ा।  दीपा बताती हैं कि वह लगातार यही समझाती रहीं कि वे यहां पढ़ाने आई हैं। इसमें किसी का कोई नुकसान नहीं है। तीन-चार साल उन्हें गांव और आसपास के लोगों में विश्वास जमाने में लग गए। आखिर में उन्हें पहली सफलता उसी उग्रवादी को समझाने में मिली जो उन्हें स्कूल में एके-47 लेकर धमकाने आया था। दीपा ने बताया कि इससे उनकी हिम्मत और बढ़ गई। यह सिलसिला आज तक जारी है।