तीन कृषि कानूनों को लेकर पिछले लगभग एक महीने से सरकार और किसानों के बीच चला आ रहा गतिरोध शुक्रवार को आठवें दौर की वार्ता के बाद भी समाप्त नहीं हो सका। लिहाजा बैठक की अगली तारीख 15 जनवरी तय की गई। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि वार्ता के दौरान किसान संगठनों द्वारा तीनों कानूनों को निरस्त करने की उनकी मांग के अतिरिक्त कोई विकल्प प्रस्तुत नहीं किए जाने के कारण कोई फैसला नहीं हो सका।

लगभग दो घंटे तक चली बैठक के बाद संवाददाताओं से बातचीत में तोमर ने कहा कि सरकार को उम्मीद है कि अगली वार्ता में किसान संगठन के प्रतिनिधि वार्ता में कोई विकल्प लेकर आएंगे और कोई समाधान निकलेगा। एक तरह से उन्होंने कानूनों को निरस्त करने की मांग यह कहते हुए खारिज कर दी कि देश भर के अन्य किसानों के कई समूहों ने इन कृषि सुधारों को समर्थन किया है। तोमर ने इस बात से इनकार किया कि सरकार ने किसानों के समक्ष कृषि कानूनों से संबंधित सुप्रीम कोर्ट में लंबित एक मामले में शामिल होने का कोई प्रस्ताव रखा। उन्होंने हालांकि कहा कि सुप्रीम कोर्ट जो भी फैसला लेगा, सरकार उसका अनुसरण करेगी।

सूत्रों ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में 11 जनवरी को होने वाली सुनवाई को ध्यान में रखते हुए अगली वार्ता तय की गई है। सरकारी सूत्रों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट किसान आंदोलन से जुड़े अन्य मुद्दों के अलावा तीनों कानूनों की वैधता पर भी विचार कर सकता है। यह पूछे जाने पर कि क्या सरकार इन कानूनों को लागू करने का अधिकार राज्यों पर छोड़ने के प्रस्ताव पर विचार करेगी, तोमर ने कहा कि इस संबंध में किसान नेताओं की ओर से कोई प्रस्ताव नहीं आया है। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा कोई प्रस्ताव आता है तो सरकार उस वक्त फैसला लेगी।

तोमर ने कहा, ‘‘वार्ता में तीनों कानूनों पर चर्चा होती रही लेकिन कोई निर्णय आज नहीं हो सका। सरकार का लगातार यह आग्रह रहा कि कानूनों को निरस्त करने के अतिरिक्त कोई और विकल्प अगर यूनियन दें तो सरकार उस पर विचार करेगी। लेकिन बहुत देर तक चर्चा के बाद भी कोई विकल्प आज प्रस्तुत नहीं किए जा सकें। इसलिए चर्चा का दौर यहीं स्थगित हुआ।’’ उन्होंने कहा कि किसान संगठनों और सरकार के बीच अगले दौर की वार्ता आपसी सहमति से 15 जनवरी को तय की गई। बैठक के बाद किसान नेता जोगिंदर सिंह उगराहां ने कहा कि बैठक बेनतीजा रही और अगली वार्ता में कोई नतीजा निकलेगा, इसकी संभावना भी नहीं है।

किसान नेता कहा, ‘‘हम तीनों कानूनों को निरस्त करने के अलावा कुछ और नहीं चाहते।’’ उन्होंने कहा, ‘‘सरकार हमारी ताकत की परीक्षा ले रही है लेकिन हम झुकने वाले नहीं हैं। ऐसा लगता है कि हमें लोहड़ी और बैशाखी भी प्रदर्शन स्थलों पर मनानी पड़ेगी।’’ एक अन्य किसान नेता हन्नान मोल्लाह ने कहा कि किसान जीवन के अंतिम क्षण तक लड़ने को तैयार है। उन्होंने अदालत का रुख करने के विकल्प को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि किसान संगठन 11 जनवरी को आपस में बैठक कर आगे की रणनीति पर चर्चा करेंगे। तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने की अपनी मांग पर अड़े किसान नेताओं ने सरकार से दो टूक कहा कि उनकी ‘‘घर वापसी’’ तभी होगी जब वह इन कानूनों को वापस लेगी।