ढाका। अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (आईसीटी) ने बंगलादेश मुक्ति संग्राम 1971 के दौरान मानवता के खिलाफ हुए अपराधों के एक मामले की सुनवायी के बाद गुरूवार को मौलवीबजार के बारालेखा में तीन रजाकारों को मौत की सजा सुनायी। तीन सदस्यीय पीठ जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ती मोहम्मद शाहीनूर इस्लाम कर रहे थे, ने इस आदेश को पारित किया। 

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इस पीठ में न्यायमूर्ती अबू अहमद जोमादर और न्यायमूर्ती के एम हफिजूल आलम शामिल थे। अब्दुल अजीज उर्फ हाबुल, उसका भाई मोहम्मद अब्दुल मतीन और अब्दुल मन्नान उर्फ मोनाई को मौत की सजा दी गई, हालांकि एक अन्य अब्दुल मतीन अभी फरार चल रहा है। उल्लेखनीय है कि आईसीटी ने इन तीनों के खिलाफ 16 अक्टूबर 2014 को जांच की शुरूआत की थी, जो 14 नवंबर 2016 को समाप्त हुई। 

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इन तीनों के खिलाफ 1971 के बंगलादेश मुक्ति संग्राम के दौरान मानवता के खिलाफ हत्या, नरसंहार, दुष्कर्म और उत्पीडऩ का आरोप लगाया गया था। मुक्ति संग्राम के दौरान अब्दूल अजीज और अब्दूल मतीन ने कथित रूप से प्रशिक्षण के लिए भारत आ गए, लेकिन प्रशिक्षण पूरा किए बगैर ही ये सभी पूर्वी पाकिस्तान लौट गए और रजाकार सेना में शामिल हो गए, जो बंगलादेश की मांग कर रही सेनाओं के खिलाफ पाकिस्तान की तरफ से लड़ी थी।