उच्चतम न्यायालय (Supreme court) ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेता एवं पश्चिम बंगाल विधान सभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी (Shubhendu Adhikari) की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगाने के कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली राज्य सरकार की याचिका पर सुनवायी करने से सोमवार को इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति ए.एस. बोपन्ना की पीठ ने उच्च न्यायालय के प्रथम दृष्टया राय को उचित मानते हुए इस मामले के गुण-दोषों पर विचार करने से इनकार कर किया। 

पीठ ने कहा कि कलकत्ता उच्च न्यायालय (Calcutta High Court) ने पश्चिम बंगाल सरकार को चार सप्ताह में हलफनामा दाखिल करने तथा दो सप्ताह में अपना जवाब दायर करने की मंजूरी थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इन तथ्यों पर उच्च न्यायालय की प्रथम दृष्टया राय अंतिरम आदेश के हक में लगती है। पश्चिम बंगाल सरकार (Government of West Bengal) का पक्ष रख रहे वरिष्ठ वकील कल्याण बंदोपाध्याय ने सुनवायी के दौरान पीठ से कहा कि आपराधिक मामलों के आरोपी नेता अधिकारी की गिरफ्तारी से अंतिम रोक का आदेश देते समय उच्च न्यायालय ने कई जरूरी कानूनी पहलूओं पर गौर नहीं किया। 

इस वजह से उसने उसके सभी आपराधिक मामलों के लिए गिरफ्तारी पर रोक लगाने का अंतरिम आदेश दिया। अधिकारी पर गुंडागर्दी, कोविड दिशा-निर्देशों की धज्जियां उड़ाने और अवैध रूप से भीड़ इकट्ठा करने के आरोपों में पश्चिम बंगाल के विभिन्न थानों में कम से कम छह मामले दर्ज हैं। अधिकारी ने हालांकि कलकत्ता उच्च न्यायालय (Calcutta High Court) में दलील दी कि पिछले साल तृणमूल कांग्रेस (TMC) से भाजपा में आने के कारण उन्हें झूठे आपराधिक मामलों में फंसाया गया। उन्होंने आरोप लगाया था कि उन्हें फंसाने के लिए तत्कालील ममता बनर्जी सरकार ने राजनीतिक द्वेष से सरकारी तंत्र का वेजा इस्तेमाल किया। राज्य के पूर्वी मेदिनीपुर जिले के ताकतवर नेता अधिकारी गत वर्ष दिसंबर में तृणमूल कांग्रेस छोड़ने से पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की बेहद करीबी नेताओं में से एक थे, जिन्होंने विधानसभा चुनाव से पहले पाला बदलकर भाजपा में शामिल हुए थे।