Corona वायरस महामारी की शुरुआत में कहा गया था कि ये बच्‍चों को प्रभावित नहीं करती। लेकिन अब कई एक्‍सपर्ट्स का कहना है कि इस बीमारी की तीसरी लहर का बच्‍चों पर बहुत प्रभाव पड़ेगा। इसी के चलते सोमवार को महाराष्‍ट्र के अहमदनगर में 10,000 बच्‍चों और टीनएजर्स के कोविड पॉजिटिव टेस्‍ट होने की खबर ने पेरेंट्स को और परेशान कर दिया है। राज्‍य और जिला प्रशासन बच्‍चों को संभालने में लग गए हैं।

मुंबई में कई अस्‍पताल अपने यहां चाइल्‍ड वार्ड तैयार कर रहे हैं। हालांकि पीडियाट्रीशियंस को तीसरी लहर से ज्‍यादा उसकी 'हाइप' की चिंता है। आइए समझते हैं कि उन्‍हें क्‍यों लगता है कि डर का जैसा माहौल बनाया जा रहा है, असल में वैसा होने की संभावना नहीं है।

इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्‍स (IAP) ने पिछले सप्‍ताह कहा कि 'इस बात की संभावना बेहद कम है कि तीसरी लहर मुख्‍य रूप से या सिर्फ बच्‍चों को ही प्रभावित करेगी।' अगर बड़ी संख्‍या में कोविड-19 मरीज सामने आते हैं तो उनमें बच्‍चों के होने की भी संभावना है।

मुंबई में बच्‍चों की संक्रामक बीमारियों की विशेषज्ञ डॉ. तनु सिंहल ने कहा कि कोविड से बच्‍चों को उतना ही खतरा है जिनका वयस्‍कों को। उन्‍होंने अगस्‍त 2020 में दिल्‍ली के भीतर हुए दूसरे सीरोलॉजिकल सर्वे का उदाहरण दिया। उसमें पता चला था कि 5 से 17 साल के 34.7% बच्‍चे को कोविड-19 हुआ था।

एक डायग्‍नोस्टिक कंपनी ने कई शहरों के सर्वे में पाया कि 10-17 साल के बच्‍चों में से करीब एक-चौथाई में ऐंटीबॉडीज थीं। फिर भी, अधिकतर बच्चे एसिम्‍प्‍टोमेटिक थे। महाराष्‍ट्र सरकार के कोविड अपडेट के अनुसार, कुल मरीजों में से बच्‍चों और टीनएजर्स की संख्‍या करीब 10% है।
एक सरकारी अस्‍पताल के सीनियर डॉक्‍टर ने कहा कि अधिकतर बच्‍चों का टेस्‍ट इसलिए होता है क्‍योंकि वे मरीजों के 'हाई रिस्‍क कॉन्‍टैक्‍ट्स' होते हैं, इसलिए नहीं कि उनमें कोरोना के लक्षण दिखते हैं।

डॉ. सिंहल ने कहा कि कोविड-19 संक्रमित 99% बच्‍चे घर में ही रिकवर हो जाते हैं। वे मुंबई के कोकिलाबेन अस्‍पताल में फुल-टाइम स्‍पेशलिस्‍ट हैं। उन्‍होंने कहा क‍ि पिछले तीन महीनों में 18 साल से कम उम्र के बच्‍चों में निमोनिया के केवल दो मामले आए हैं।

ठाणे के जुपिटर अस्‍पताल में चीफ पीडियाट्रिक इंटेसिविस्‍ट और महाराष्‍ट्र की पीडियाट्रिक टास्‍क फोर्स के सदस्‍य, डॉ. परमानंद अंदनकर ने कहा, "अगर अहमदनगर में 10,000 बच्‍चे कोविड संक्रमित मिले तो यह उनके पॉजिटिव होने से जुड़ा आंकड़ा है। उनमें से ज्‍यादातर की स्थिति गंभीर नहीं थी, न ही उन्‍हें अस्‍पताल में भर्ती कराने की जरूरत थी।"

दुनियाभर में डॉक्‍टर्स ने बच्‍चों और टीनएजर्स में एक दुर्लभ इनफ्लेमेटरी कंडिशन का इलाज किया है जो कोविड-19 होने के करीब चार हफ्ते बाद होती है। इसे 'पीडियाट्रिक इनफ्लेमेटरी मल्‍टीसिस्‍टम सिंड्रोम' (PIMS)' कहते हैं जो दिल पर असर डाल सकता है और हालात गंभीर हो सकते हैं। लाल आंखों और रैशेज को PIMS का लक्षण समझकर मेडिकल मदद लें।
डॉ. अंदनकर मानते हैं कि बच्‍चों में कोविड-19 के मुकाबले PIMS ज्‍यादा चिंता की बात होनी चाहिए। उन्‍होंने कहा, "कोविड-19 से कहीं ज्‍यादा बच्‍चे PIMS की वजह से अस्‍पताल में भर्ती होंगे।" जून 2020 में पहली लहर के बाद, जब PIMS को अधिक गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था, तब मुंबई के अस्‍पतालों में कई ऐसे बच्‍चे भर्ती हुए जिन्‍हें गंभीर इनफ्लेमेशन और वस्‍कुलाइटिस (धमनियों में सूजन) था। इनमें से कई बच्‍चों की मौत हो गई।"
जब उन्‍हें भर्ती किया गया, तब वे कोविड निगेटिव थे मगर शरीर में ऐंटीबॉडीज थीं जो पहले संक्रमण का इशारा करती हैं। बच्‍चों को बुखार, पेटदर्द, उलटी होना, रैशेज, पैरों में और लिम्‍फ नोड्स में सूजन जैसे लक्षण थे जो कावासाकी बीमारी में भी होते हैं।

डॉ. अंदनकर ने कहा, "जब शहर में कोविड-19 के ऐक्टिव केसेज घट रहे थे तब PIMS के मरीज बढ़ रहे थे।" मुंबई और आसपास के शहरों में अब दूसरी लहर धीमी पड़ रही है और PIMS के मामले बढ़ रहे हैं। हर दिन एक बच्‍चे को भर्ती करने की जरूरत पड़ रही है। PIMS के कई लक्षण मॉनसून से जुड़ी बीमारियों जैसे डेंगू से भी मिलते-जुलते हैं। ऐसे में गांवों में इसकी पहचान करने में गलती हो सकती है।

बच्‍चों में कोविड और PIMS को लेकर राहत की बात यह है कि उनका इलाज आसानी से हो सकता है। PIMS वाले बच्‍चों को बड़ों के मुकाबले अधिक मात्रा में स्‍टेरॉयड्स की जरूरत पड़ती है। यह उन्‍हें इंट्रावीनस (नसों के जरिए) दिए जाते हैं मगर यह महेंगे होते हैं। डोज कितनी होगी, यह बच्‍चों के वजन पर निर्भर करता है। एक सरकारी डॉक्‍टर ने कहा कि 'कुछ बच्‍चों में ऐसे एक IV की कीमत 1 लाख रुपये तक हो सकती है।'