कोरोना वायरस को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है कि यह युवाओं पर ज्यादा अटैक कर रहा है। तमाम अनिश्चितताओं के बीच युवाओं में बीमारी की गंभीरता को लेकर अनुमान लगाना मुश्किल हो रहा है। युवाओं में रिस्क फैक्टर का पता नहीं लग रहा है।

अपोलो हॉस्पिटल्स की तरह एम्स ने भी इस वायरल इंफेक्शन को लेकर छह से सात बार क्लिनिकल मैनेजमेंट की गाइडलाइन्स में बदलाव किए हैं। दिल्ली एम्स में कोविड टास्क फोर्स के मेंबर डॉ. अंबुज रॉय का कहना है कि जब महामारी की शुरुआत हुई थी तब ऑक्सीजन सेचुरेशन के बहुत कम होने पर डॉक्टर पेशेंट को मेकेनिकल वेंटिलेशन पर रखते थे। हालांकि, धीरे-धीरे डॉक्टरों को पता लगा कि ऑक्सीजन थेरेपी या वेंटिलेशन को श्रेणीबद्ध तरीके से किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि कैसे मलेरिया-रोधी दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वाइन का इस्तेमाल शुरू में एक रोगनिरोधी दवा के रूप में किया गया। साथ ही संक्रमण के इलाज के लिए किया गया था। हालांकि, कई स्टडी से पता चला कि इसका कोई महत्वपूर्ण लाभ नहीं दिखा। कोविड के इलाज में तीन महत्वपूर्ण चीजें हैं। पहला वायरल लोड कम करने वाली दवा, साइटोकिन स्टॉर्म को कम करने वाले स्टेयरॉयड्स और ऐसी दवा जो खून के थक्के बनने से रोके।