कोरोना से अब तक कम से कम सारी दुनिया में 4 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। और 4 कोरोड़ से ज्यादा लोग कोरोना के शिकार हो चुके है। अभी भी कोरोना का संक्रमण में कम नहीं हुआ है यह समय के रहते फैलता ही जा रहा है। वैक्सीन समय पर ना बन पाने के कारण कोरोना को खत्म करना मुश्किल हो गया है। अभी भी कोरोना से मौतों का सिलसिला चालू है। कई वैज्ञानिकों ने कोरोना के बारे में बताया कि कोरोना कई तरीकों से शरीर पर अटैक करता है। जिससे शरीर बुरा प्रभाव पड़ता है।


हाल ही में वैज्ञानिको के शोध के मुताबिक डॉक्टरों ने कहा कि कोरोना वायरस ज्यादातर युवाओं के शरीर को नुकासान पहुंचाता है। हाल ही सामने एक केस आया है जिसमे 36 साल की महिला के फेफड़े कोविड संक्रमण से 80 प्रतिशत खराब हो गए है। जब हालात ज्यादा खराब हुए तो डी-डायमर जांच से पता चला कि मरीज में ‘साइटोकॉइन स्टॉर्म’ आ चुका है। महिला को बचाया नहीं जा सका। फेफड़े 50 प्रतिशत खराब हो जाने पर टॉसिलिजुमैब इंजेक्शन लगाया जाता है और प्लाज्मा थैरेपी दी जाती है और इसी के साथ रेमेडेसिविर इंजेक्शन भी लगाए जाते हैं।


इस तरह के मामलों में कोरोना से अब तक मारे गए 659 लोगों में करीब 263 लोगों की जान इसी स्टॉर्म से गई है। बचे हुए मरीजों की मौत ARDS (एक्यूट ऑक्सीजन रेस्पिरेटरी सिंड्रोम) से हुई है। प्रो. डॉ. मनोज केला बताते हैं कि कोरोना मरीज भी स्टॉर्म के असर से अचानक गंभीर हो जाता है जिसके कारण से टिश्यू तक ऑक्सीजन नहीं पहुंचने की वजह से मल्टी ऑर्गन फेल्योर हो जाता है। चेस्ट फिजिशियन डॉ. रवि डोसी कहते हैं कि शरीर में साइटोकॉइन बनना नॉर्मल प्रोसेस है।


जब इम्यून सिस्टन कमजोर होता है तो कोरोना अनकंट्रोल स्पीड से बनने लगते हैं। इसे ‘साइटोकॉइन-स्टॉर्म’ कहते हैं। इसमें इम्यून सिस्टम ओवर-रिएक्ट करता है। इम्यून सिस्टम की कोशिकाएं जो शरीर को बचाती है वो शरीर के विपरीत काम करने लगती हैं। यह उन लोगों में होता है जिन लोग उम्रदराज, पुरानी लंबी बीमारी से जूझ रहे और शारीरिक रूप से कम एक्टिव लोगों में इसका खतरा ज्यादा है।