नई  दिल्ली. दवा के पैकेटों पर जल्द ही अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के साथ फैक्ट्री में बनने में आई लागत भी लिखी होगी. इससे उपभोक्ताओं को पता चलेगा कि दवा का असली दाम क्या है और कंपनियां उस पर कितना मुनाफा कमा रही हैं।


सरकार का मानना है कि इससे दवा बाजार में पारदर्शिता आएगी. मनमाने दाम वसूलने की जगह दवा कंपनियों पर दाम कम रखने का दबाव भी बढ़ेगा. आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, दवा के रैपर पर एमआरपी के अलावा एक्स फैक्ट्री प्राइस यानी (टैक्स को छोड़कर कारखाने में बनने की लागत) भी लिखी होगी।

अगर दवा विदेश से आयात की गई है तो उस पर लैंडेड प्राइस यानी भारत आने के वक्त की कीमत लिखी होगी. समझा जाता है कि केंद्रीय दवा मानक नियंत्रण संगठन ने ड्रग्स एंड कास्मेटिक्स एक्ट के नियम 96 में संशोधन का प्रस्ताव रखा है. इस बदलाव के बाद सभी दवा निर्माताओं के लिए यह जानकारी पैकेटों पर लिखना अनिवार्य हो जाएगा।


सरकार के एक अधिकारी ने कहा कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय जल्द ही इसका मसौदा जारी करेगा, ताकि संबंधित पक्षों की राय ली जा सके. अधिकारी के मुताबिक, इससे दवा कंपनियों पर अपना लाभ कम से कम रखने का दबाव होगा. उपभोक्ता भी लागत और एमआरपी का अंतर देखते हुए बेहतर कंपनी की दवा खरीदेंगे और पैसा बचाएंगे. यह दवा बाजार में निर्माताओं के बीच कीमत न्यूनतम रखने की प्रतिस्पर्धा को भी बढ़ाएगा और किफायती मूल्य पर दवा मिल सकेगी. आमतौर पर एक ही फार्मूले की दवा की कई तरह कीमतें देखने को मिलती हैं।


हालांकि दवा संगठनों का कहना है कि सरकार को इसकी बजाय आयातित दवा के लैंडेड प्राइस से एमआरपी के बीच अंतर का दायरा 3-4 गुना के बीच सीमित रखना चाहिए. बेहद ज्यादा एमआरपी लगाने वालों को अतिरिक्त टैक्स लगाना चाहिए, ताकि वे हतोत्साहित हों. फिलहाल निर्माता या आयातक को टैक्स का कुछ भी वहन नहीं करते. वे केवल एमआरपी और प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ने पर ध्यान देते हैं. इससे बनावटी रूप से दवा के दाम बढ़ते हैं और उपभोक्ता को इसका बोझ उठाना पड़ता है।


कंपनियां फायदे में

नियम 96 के अनुसार, फिलहाल कंपनियों को पैकेट पर सभी करों सहित एमआरपी लिखनी होती है. इसके अलावा दवा निर्माता कंपनी का नाम, स्थान, दवा का नाम, तारीख, बैच नंबर, वजन, मात्रा आदि ही लिखना होता है. दवा के फार्मूले में मिलाए गए तत्वों की जानकारी भी देनी होती है. लेकिन उत्पादन लागत का उल्लेख नहीं होता।


उत्साहित नहीं हैं उद्योग संगठन

दवा उद्योग संगठन इस बदलाव को लेकर उत्साहित नहीं हैं. एसोसिएशन ऑफ इंडियन मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री के फोरम संयोजक राजीव नाथ ने कहा कि प्रस्ताव जटिल है. आयात के दाम लगातार बदलते रहते हैं और लगातार इसमें बदलाव संभव नहीं है. इसको लेकर स्वास्थ्य मंत्रालय और राष्ट्रीय औषधि मूल्य एजेंसी(एनपीएए) के बीच भी मतभेद हो सकते हैं।