पूर्वोत्तर में लोकसभा चुनाव शुरू होने जा रहे हैें। वैसे तो बीजेपी ने नागरिकता बिल से असमिया को नाराज कर दिया है जिससे ये तो निश्चित हो गया है कि बीजेपी इस बार पूर्वोत्तर में अपना परचम नहीं लहरा पाएगी। बीजेपी नॉर्थ ईस्ट में अकेली पड़ गई है। अब यहां पर कांग्रेस के लिए यह लड़ाई जीत के लिए नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को बचाने के लिए होगी।


पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के यहां से एट सांसद चुने गए थे। बीजेपी जहां यहां विस्तार की बात कर रही है, वहीं कांग्रेस को अपने अस्तित्व को बचाने की योजना बनानी होगी। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पांच साल पहले तक नॉर्थ ईस्ट कांग्रेस का गढ़ था।
जैसे-जैसे नॉर्थ ईस्ट के राज्य बनते गए और केंद्र की कांग्रेस सरकारों का उनके साथ सामंजस्य अच्छा होता गया, पार्टी की क्षेत्रीय इकाइयों को अपना दबदबा बढ़ाने के लिए उनकी राजधानियों के रूप में गढ़ मिल गए। कांग्रेस का कुछ क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन था, लेकिन कभी भी उन्हें बहुत अधिक की जरूरत नहीं हुई।
2014 के लोकसभा चुनाव ने वह सब बदल दिया। कांग्रेस, बीजेपी और उसके सहयोगियों को कोस रही है। पहले असम, उसके बाद मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय और अंत में, मिजोरम के मैदान में कांग्रेस ने बीजेपी और उसके सहयोगी दलों में जमकर हमला बोला। त्रिपुरा में पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली। नागालैंड में भी इसकी किस्मत ऐसी ही थी।