देश के चार राज्यों पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं।  तमिलनाडु में 6 अप्रैल को वोटिंग है।  ऐसे में तमाम पार्टियां और उम्मीदवार मतदाताओं को लेकर लुभाने के लिए अजीब-अजीब वादे कर रहे हैं।  मद्रास हाईकोर्ट ने इन लुभावने चुनावी वादों को लेकर तल्ख टिप्पणी की है। 

मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस एन. किरुवकरन और जस्टिस बी. पुगलेंधी ने बुधवार को कहा कि उम्मीदवारों को फ्री लैपटॉप, टीवी, पंखे, मिक्सी और अन्य चीजों के बजाय बुनियादी सुविधाओं को मेनिफेस्टों में शामिल करना चाहिए।  कोर्ट ने कहा कि बेहतर हैं कि राजनीतिक पार्टियों के प्रत्याशी ऐसे मुफ्त सामान देने के वादे की जगह मतदाताओं को पानी, बिजली, स्वास्थ्य और ट्रांसपोर्ट सुविधाएं बेहतर करने के वादे करें।  साथ ही चुनाव जीतने पर उन वादों को पूरा भी करें। 

जजों का कहना है कि करदाता राज्य में मुफ्त वादों की बारिश में भीगने के इच्छुक नहीं हैं।  अगर यही चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं है, जब तमिलनाडु में प्रवासी श्रमिक सभी संपत्तियों के मालिक होंगे और यहां के निवासी उनके अधीन होंगे।  जजों ने कहा कि राज्य में बेरोजगारी बढ़ती जा रही है।  आलम ये है कि इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स नौकरी के लिए सरकारी दफ्तरों में सफाईकर्मी बनने तक तैयार हैं। 

 उन्होंने कहा कि हम जानना चाहते हैं कि क्या चुनाव घोषणापत्रों में तर्कसंगत वादे करने को लेकर चुनाव आयोग द्वारा कोई कदम उठाए गए हैं? क्या इस तरह के घोषणापत्रों की जांच करने और राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए केंद्र सरकार कोई कानून लाने का प्रस्ताव रखती है?

जजों ने कहा कि बिरयानी और क्वॉर्टर बोतल चुनाव में एक वास्तविकता बनकर रह गई है।  जो लोग इनके लिए अपना मत बेचते हैं, उन्हें बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलने की शिकायत करने का कोई अधिकार नहीं है।  ऐसे मतदाता अपनी तरह के प्रतिनिधि के ही योग्य हैं, जो सिर्फ वादे करें उनपर अमल न करें।