नई दिल्ली. देश में कोयले का संकट अभी टला नहीं है. कई कोयला खदानों में उत्पादन इस वक्त बीते 9 साल के मुकाबले सबसे निचले स्तर को छू रहा है. वहीं दूसरी तरफ, गर्मी के मौसम में बिजली की खपत बढ़ रही है. कोरोना के दौर से बाहर आने के बाद उद्योगों को भी अपना उत्पादन बढ़ाने और पिछले नुकसान की भरपाई के लिए अधिक बिजली चाहिए. इन स्थितियों में जानकारों का मानना है कि देश के कई राज्यों में घंटों बिजली कटौती का दौर इस बार फिर लौट सकता है.

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जानकारी के अनुसार, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश में तो बिजली-कटौती का सिलसिला शुरू भी हो चुका है. देश के सबसे बड़े औद्योगिक राज्य महाराष्ट्र तो अनिवार्य बिजली कटौती लागू करने के मुहाने पर पहुंच चुका है. वहीं गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने अपनी ऊर्जा-कंपनियों को महंगे दामों पर अन्य राज्यों से बिजली खरीदने की इजाजत दी है. ताकि बिजली-कटौती से बचा जा सके. अभी हाल के ही कुछ विश्लेषण बताते हैं कि मांग की तुलना में इस वक्त बिजली आपूर्ति में 1.4 प्रतिशत की कमी है. यह नवंबर-2021 में हुई 1 प्रतिशत कमी से भी ज्यादा है. याद दिला दें कि उस वक्त देश ने कुछ दिन तक गंभीर रूप से कोयले की कमी का सामना किया था, जो कि देश में ऊर्जा उत्पादन का मुख्य संसाधन है.  

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खबरों के मुताबिक, महाराष्ट्र में बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच 2,500 मेगावॉट का फर्क है. इसके बाद राज्य बिजली वितरण कंपनी ग्रामीण और शहरी इलाकों में समान रूप से अनिवार्य बिजली कटौती लागू कर रही है. महाराष्ट्र में इस वक्त 28,000 मेगावॉट बिजली की मांग है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में 4,000 मेगावॉट बिजली की मांग थी. इसी के बाद राज्य ऊर्जा नियामक आयोग को बिजली कटौती की योजना बनाकर भेजी गई है. वहां से मंजूरी के बाद कटौती लागू हो जाएगी.

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आंध्र प्रदेश में भी महाराष्ट्र जैसे ही हाल हैं. वहां बिजली की मांग और आपूर्ति में 8.7 प्रतिशत की कमी बनी हुई है. इससे उद्योगों को भी उनकी जरूरत की तुलना में 50 प्रतिशत ही बिजली मिल पा रही है. राज्य के अंदरूनी इलाकों में कई-कई घंटों की बिजली कटौती हो रही है. इससे आक्रोशित जनता विरोध प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतर रही है. हालांकि इसके बावजूद मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी की सरकार इस स्थिति को अस्थायी बता रही है.

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सरकार के आंकड़े बताते हैं कि झारखंड, बिहार, हरियाणा और उत्तराखंड में इस वक्त बिजली की मांग के मुकाबले आपूर्ति में 3 प्रतिशत की कमी है. वहीं, केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय का आकलन है कि देश के कुल ऊर्जा उत्पादन में मार्च-2023 तक 15.2त्न की बढ़त हो सकती है. जबकि मांग इसकी तुलना में बीते 38 सालों के मुकाबले सबसे तेजी से बढ़ सकती है. मतलब, समस्या बनी रहने वाली है.