जलवायु परिवर्तन का इस बार असर जामुन पर भी पड़ा है जिस वजह से मार्केट नहीं नहीं आ पा रही है। इसके साथ ही कोरोना की वजह से लीची और आम की फसल भी प्रभावित हुई है। इस सीजन में जामुन की फसल बहुत से स्थानों पर अच्छी नहीं हुई। कहीं-कहीं पर तो पेड़ में एक भी फल नहीं दिखा। वैसे भी जामुन की सभी किस्में हर तरह के जलवायु में समान रूप से नहीं फलती हैं। इस साल जनवरी से लगातार हो रही बारिश और काफी दिनों तक ठंड का असर रहने से जामुन के अधिकतर पेड़ों में फूल की जगह पत्तियों वाली टहनियां निकल आईं। महाराष्ट्र के कोंकण इलाके में स्थित सावंतवाड़ी जामुन के लिए मशहूर है। लेकिन, इस साल किसानों को फल नहीं लगने से नुकसान उठाना पड़ा।
40 साल पहले किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि जामुन के कलमी बाग लगेंगे। लेकिन, जामुन की बढ़ती लोकप्रियता के कारण बाजार में इसके फलों की मांग बढ़ती जा रही है। अधिक लाभ के कारण किसानों के बीच यह फल लोकप्रिय होता जा रहा है। आमतौर पर जामुन की बाग बीजू पौधों से लगाए जाते हैं लेकिन किसानों की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए आईसीएआर के ने जामुन की कलम बनाने का तरीका निकाला है। अभी कलमी पौधों की मांग निरंतर बढ़ती जा रही है।
Central Institute for Subtropical Horticulture के निदेशक डा. शैलेंद्र राजन के मुताबिक उनके यहां विकसित की गई जामुन की किस्में सीआईएसएच-जामवंत और सीआईएसएच जामुन-42 दोनों ही लोकप्रिय होते जा रहे हैं। किसान हजारों पौधों की मांग कर रहे हैं। सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र एवं तमिलनाडु से निरंतर संपर्क करते हैं। कलमी पौधों की बढ़ती हुई मांग के अनुसार इतनी अधिक संख्या में पौधे बनाना कठिन है। तब भी, जितना बन पड़ता है, पौधे तैयार किये जा रहे हैं।
कुछ वर्ष पहले तक जामुन के बीजू पौधों से इसके बाग लगाये जाते थे। किसान अपने बाग में 1-2 पौधे जामुन के शौकिया तौर पर लगा लेते थे। लेकिन आज किसान जामुन के सैकड़ों पौधे लगाने के लिए तैयार हैं। गुजरात और महाराष्ट्र में जामुन की खेती से कुछ किसान अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। दिल्ली और बड़े शहरों में यह बढ़िया किस्म का जामुन 200 से 300 रुपये किलो में आसानी से बिक जाता है। फलों की बढ़ती मांग को देखकर पंजाब में कई किसानों ने जामुन की खेती करने के लिए उत्साहित होकर आईसीएआर के उस संस्थान से संपर्क किया है। संस्थान द्वारा निकाली गई CISH-जामवंत किस्म के फलों में 90 प्रतिशत से भी अधिक गूदा होने के कारण इसकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही है।
आम से कई गुना अधिक दाम में बिकने के बाद भी जामुन का व्यापार बहुत आसान नहीं है। पकने के बाद जामुन तुरंत खराब होने लगता है। इसमें जरा सी असावधानी हो तो सारे फल फफूंद से ग्रस्त हो जाते हैं। बरसात में इस फफूंद को रोकना और कठिन हो जाता है। ऐसी स्थिति में जामुन के प्रसंस्कृत उत्पाद बनाने के लिए भी लोग आकर्षित हुए हैं। महाराष्ट्र में लोगों ने जामुन की वाइन बनाना प्रारंभ कर दिया है। ऐसा माना जाता है कि जामुन वाइन (jamun wine) ग्रेप वाइन (grape wine) एक अच्छा विकल्प है।
कोरोना की मार से जामुन भी अछूता नहीं रहा। बाजार में बढ़ती लोकप्रियता के कारण बाद भी इसकी ज्यादा उपस्थिति दर्ज ना हो पाई। खरीदारों की कमी और माल का ना आना किसानों और व्यापारियों के लिए अच्छा नहीं रहा। बहुत से जामुन प्रेमियों को इस साल इसकी कमी खली लेकिन लॉकडाउन के चलते सब मजबूर हैं। औषधीय गुणों से भरपूर इस फल के बारे आयुर्वेद में बताई गई बातें विज्ञान की कसौटी पर भी सही उतर रही हैं। केवल डायबिटीज से पीड़ित मरीज़ों के लिए ही नहीं, बल्कि सभी के लिए यह एक बेहद लाभकारी एवं पौष्टिक फल है।