चीन में ऐसी गुफाएं हैं जहां कोई नहीं जा सकता और इनको ही कोरोना वायरस का ब्लैक होल माना जा रहा है। दुनिया मानती है कि कोरोना वायरस की उत्पत्ति चीन से ही हुई है। इसकी पुष्टि यहां से होती है कि आज से करीब 12 साल पहले चीन के एक गांव में मौजूद पहाड़ी खदान में रहस्यमयी निमोनिया की वजह से तीन खनन कर्मियों की मौत हो गई थी। इसके बाद से लगातार इस खदान को चीन ने बंद करके रखा है। यहां जाना संभव ही नहीं है। कुछ अंतरराष्ट्रीय पत्रकार यहां जाना चाहते थे लेकिन उनके साथ  जो हुआ  वो इस प्रकार है-
चीन में चमगादड़ों की गुफाओं को कोरोना वायरस का ब्लैक होल कहा जाता है। दक्षिणी चीन में स्थित इन गुफाओं में मौजूद चमगादड़ों की वजह से निकले कोरोना वायरस से दुनिया भर में 17 लाख लोगों की मौत हो गई। जिस पहाड़ी खदान में 12 साल पहले तीन मजदूर रहस्यमयी निमोनिया से मरे थे वहां से मिले सबूत ये बताते हैं कि आज के कोरोना वायरस से उस समय का वायरस मिलता-जुलता था।
इन गुफाओं में दुनिया भर के वैज्ञानिक जाना चाहते हैं ताकि कोरोना को लेकर रिसर्च की जा सके। लेकिन चीन सरकार इन गुफाओं तक किसी को जाने नहीं देती। पत्रकारों ने भी वहां जाने की कोशिश की लेकिन जा नहीं पाए। उन्हें सीक्रेट पुलिसकर्मियों और गांव के लोगों ने आगे जाने नहीं दिया। यहां तक कि सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों ने पत्रकारों की गाड़ी का पीछा किया।
चीन की सरकार ने कोरोना वायरस के स्थानीय एक्सपर्ट्स को मीडिया से बात करने से मना कर दिया है। इतना ही नहीं कोरोना वायरस से रिलेटेड स्टडी और रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों पर चीन सरकार की पूरी नजर रहती है। अगर कुछ सरकार के विपरीत होता है तो तुरंत उसे बंद करवा दिया जाता है। फिर इन साइंटिस्ट्स को कहा जाता है कि लोगों से ये कहो कि कोरोना वायरस चीन के बाहर से फैला है।
चीन की सरकार करोड़ों रुपये का ग्रांट चीन के वैज्ञानिकों को दे रही है ताकि वे कोरोना वायरस पर रिसर्च कर सकें। लेकिन इन वैज्ञानिकों को चीन की सेना के साथ जोड़ दिया गया है। इनकी हर हरकत पर चीन की सेना की नजर रहती है। चीन में हुए किसी भी रिसर्च को पब्लिश कराने से पहले चीन की सरकार के कैबिनेट से पास कराना होता है। कैबिनेट को अगर सबकुछ सही लगता है तो ही रिसर्च पेपर सामने आता है।

कोरोना वायरस को लेकर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में एक टास्क फोर्स बनी है। ये टास्क फोर्स पूरे चीन में होने वाली सारी गतिविधियों पर नजर रखती है। कोरोना वायरस को लेकर किसी भी तरह का आदेश यहीं से आता है। एपी के पत्रकारों को चीन की सरकार और स्थानीय लोगों ने उस गुफा तक नहीं जाने दिया जहां पर 12 साल पहले रहस्यमयी निमोनिया से मजदूरों की मौत हुई थी।

एपी के पत्रकारों को किसी भी तरह के रिसर्च पेपर हासिल नहीं करने दिए गए। चीन के साइंटिस्ट को कहा गया कि वे एपी के पत्रकारों की टीम से बात नहीं करेंगे। जिस जगह कोरोना वायरस का सबसे नजदीकी वैरियंट था। उस पहाड़ी खदान तक तो पहुंचने से काफी पहले ही एपी के पत्रकारों को रोक दिया गया। इसी पहाड़ी खदान में बने शैफ्ट की सफाई करते समय साल 2012 में छह मजदूर रहस्यमयी निमोनिया से बीमार हुए थे और तीन मारे गए थे।

एपी की इन्वेस्टिगेशन दुनियाभर के साइंटिस्ट्स और अधिकारियों के इंटरव्यू, पब्लिक नोटिस, लीक्ड ईमेल्सए चीन की कैबिनेट के इंटरनल डेटा और चाइनीज सेंटर फॉर डिजीस कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के दस्तावेजों पर आधारित है। इन सबसे पता चलता है कि चीन की सरकार कोरोना वायरस को लेकर कितनी सीक्रेट मुहिम चला रही है। इसी वजह से विश्व स्वास्थ्य संगठन को चीन की सरकार ने कोरोना वायरस की खबर देरी से दी थी।
क्योंकि चीन में किसी भी सूचना को सीधे प्रसारित या शेयर करने पर मनाही है। उसे पहले चीन के अधिकारी और नेता देखते हैं। देश के हित में हुई तो पहले जारी करते हैं नहीं तो उसे तब तक रोका जाता है, जब तक बेहद जरूरी न हो जाए। जब कोरोना वायरस पूरी दुनिया में फैल गया तब चीन के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा था वैज्ञानिक अंतरराष्ट्रीय रिसर्च शुरू करें और वैश्विक स्तर पर एक.दूसरे की मदद करें।
एपी के पत्रकारों की इन्वेस्टिगेशन के दौरान पता चला कि 10 और 11 जनवरी को वुहान से दर्जनों रिसर्चर्स ने सैंपल कलेक्ट किए थे। इसके बाद चीन की स्टेट मीडिया ने कहा कि जितने सैंपल कलेक्ट किए गए थे उनमें से 33 पॉजिटिव हैं। लेकिन धीरे.धीरे वैज्ञानिकों और मीडियाकर्मियों पर प्रतिबंध लगाया जाने लगा। जनवरी-फरवरी के महीने में रिसर्च पेपर्स की जो भरमार आई थी वो मार्च आते-आते लगभग खत्म हो गई।