भारत में आज से स्‍तन कैंसर जागरुकता माह (Breast Cancer Awareness Month 2021) मनाया जा रहा है जो कि 31 अक्‍टूबर तक चलेगा। इस दौरान महिलाओं को रोजाना बढ़ रही बीमारी ब्रेस्‍ट कैंसर के प्रति आगाह करने के साथ ही इससे बचने और इलाज कराने के लिए प्रेरित किया जाएगा। लेकिन आज भारत में ब्रेस्‍ट कैंसर इतना बढ़़ चुका है कि अगर थोड़ी सी लापरवाही हुई तो कोई भी महिला इसकी चपेट में आ सकती है। इसके बाद उसे कठिन इलाज से गुजरना पड़ता है। खासकर भारत के मेट्रो शहरों में महिलाएं ब्रेस्‍ट कैंसर के निशाने पर हैं।

डॉक्टर्स का कहना है कि भारत में Breast Cancer को लेकर एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है। देश में 30 साल के आसपास की महिलाओं में भी इस बीमारी के मामले अब बढ़ने लगे हैं। वहीं करीब 5 फीसदी के आसपास 30 साल से कम उम्र की महिलाएं भी हैं जो कैंसर की चपेट में आ रही हैं। जबकि अभी तक 50 साल से ऊपर की महिलाओं को ही स्‍तन कैंसर अपना शिकार बनाता था। वहीं एक और खास बात है कि देश में ब्रेस्‍ट कैंसर से पीड़‍ित होने वाली ग्रामीण महिलाओं की अपेक्षा शहरी महिलाओं (Urban Women) की संख्‍या काफी ज्‍यादा है।भारत सरकार के नेशनल कैंसर रजिस्‍ट्री प्रोग्राम की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2020 में 712,758 महिलाओं में ब्रेस्‍ट कैंसर की बीमारी पाई गई है। प्रति 29 महिलाओं में से एक महिला स्‍तन कैंसर से जूझ रही है। जहां ग्रामीण महिलाओं में 60 में से एक में ये बीमारी है। वहीं 22 में से एक शहरी महिला को ब्रेस्‍ट कैंसर की समस्‍या है। वहीं इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) की एक रिपोर्ट बताती हैं कि 2016 में कैंसर के 14.5 लाख नए मामले सामने आए थे जो 2020 में बढ़कर 17.3 लाख हो सकते हैं. वहीं एनसीआरपी (NCRP) के मुताबिक कुल कैंसर मरीजों में करीब 57 फीसदी मामले ब्रेस्‍ट कैंसर के मरीजों के हैं। लिहाजा आंकड़े काफी चिंताजनक हैं।ब्रेस्‍ट कैंसर बढ़ने की प्रमुख वजहें—
भागदौड़ और तनाव भरी जीवनशैली, शारीरिक कसरत या व्‍यायाम की कमी, प्रदूषित खानपान और पोषणयुक्‍त भोजन की कमी के कारण भी कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं।महिलाओं की शादीशुदा जिंदगी का देर से शुरू होना, देरी से बच्‍चों का होना या संतान का न होना, ग्रामीण के मुकाबले शहरी महिलाओं का जल्‍दी परिपक्‍व होना और मासिक चक्र का जल्‍दी शुरू हो जाना, हार्मोनल असंतुलन भी इसके जिम्‍मेदार हैं।कुछ मामलों में अनदेखी या लापरवाही के कारण भी गंभीरता आ जाती है। अगर शुरुआत में ही बीमारी का पता चल जाए तो हालात खराब नहीं होते लेकिन महिलाओं की अपनी बीमारी के प्रति झेलने और लापरवाही का रवैया होने के चलते ज्‍यादा नुकसान हो रहा है।