27 फरवरी को मेघालय और नागालैंड में चुनाव है और इसके लिए राज्य में सभी पार्टियों ने एड़ी चोटी का दम लगा दिया है कोई भी पार्टी पूर्वोत्तर के चुनावों में कोई कमी नहीं छोड़ना चाह रही है, मुख्य रूप से बीजेपी।


जी हां बीजेपी ने इन चुनावों में सफलता के लिए पूरा जोर लगा दिया है। सामान्यतः इतने छोटे राज्यों के चुनाव में प्रधानमंत्री को प्रचार में भाग लेने की जरूरत नहीं होती पर नरेन्द्र मोदी ने तीनों राज्यों में रैलियों को संबोधित किया है। संघ परिवार की संगठनात्मक शक्ति पूरे जोरशोर से इस चुनाव में लगी है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी यहां रैलियां की हैं।

लेकिन इसके बाद सवाल है कि बीजेपी क्या पूर्वोत्तर के ईसाई बहुल समाज में प्रवेश कर पाएगी? मेघालय और नगालैंड में ईसाई समाज बहुसंख्यक है। उत्तर भारत में गोवध का विरोध करने वाली पार्टी बीफ-सेवी वोटरों के बीच है।
 पश्चिमी देशों का मीडिया मोदी सरकार पर आरोप लगाता रहा है कि भारत में ईसाइयों पर हमले हो रहे हैं और अल्पसंख्यक समुदाय अपनी पहचान को बनाए रखने की जद्दोजहद कर रहा है। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव मानते हैं कि पूर्वोत्तर में बीजेपी ने शून्य से शुरुआत की है। यहां के किसी भी राज्य में भाजपा की जड़ें नहीं थीं। त्रिपुरा को छोड़ असम सहित ज्यादातर राज्यों में कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों का ही दबदबा था।
बीजेपी ने पूर्वोत्तर का प्रभार भी राम माधव को सौंपा। उन्होंने इस इलाके की राजनीतिक ताकतों, ख़ासतौर से नगालैंड में अलगाववादी समूहों के साथ बातचीत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
त्रिपुरा में पार्टी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संगठन शक्ति का सहारा लिया है और आदिवासियों के बीच जगह बनाई है। चूंकि त्रिपुरा में कांग्रेसी कार्यकर्ता ही वामपंथियों से टकरा रहे थे, इसलिए पार्टी ने उन्हें भी अपने साथ जोड़ा। इससे कांग्रेस कमजोर हुई और लगभग शून्य उपस्थिति से निकलकर बीजेपी ने वामदलों के मुख्य प्रतिस्पर्धी के रूप में जगह बना ली।

पूर्वोत्तर के सात राज्यों से लोकसभा की कुल 23 सीटें हैं। इनमें 14 सीटें असम में और 9 सीटें शेष 6 राज्यों में हैं। राष्ट्रीय राजनीति में भले ही पूर्वोत्तर की प्रभावी भूमिका नहीं है, फिर भी बीजेपी देश के इस कोने को जोड़े रखना चाहती है।
असम में बीजेपी के लिए मैदान आसान था, क्योंकि वहां बांग्लादेशी नागरिकों की घुसपैठ के कारण काफी पहले से साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण हो चुका है।
अरुणाचल और मणिपुर में पार्टी ने स्थानीय राजनीतिक समूहों के साथ सांठगांठ करके कांग्रेस को अपदस्थ कर दिया।


बीजेपी ने अपनी दीर्घकालीन रणनीति के तहत नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (नेडा) का गठन किया है, जिसमें पूर्वोत्तर के 10 दल शामिल हैं।

हालांकि पार्टी इसे राजनीतिक गठजोड़ नहीं कहती बल्कि इस इलाके के विकास से जुड़ा गठबंधन मानती है, पर इसमें कांग्रेस शामिल नहीं है। उसकी दिलचस्पी पहले कांग्रेस की जड़ें काटने में है।