त्रिपुरा में 35 साल बाद भाजपा प्रचंड बहुमत से पहली बार सरकार बनाने जा रही है। त्रिपुरा में भाजपा की ऐसी लहर चली कि लेफ्ट का मजबूत गढ़ ढह गया। पिछले 25 साल से सीपीएम के नेतृत्व वाला लेफ्ट फ्रंट सत्ता में था। उसका आठवीं बार सरकार बनाने का सपना टूट गया।

त्रिपुरा में सबसे बुरा हाल कांग्रेस का हुआ है जो खाता खोलने को भी तरस गई। आपको बता दें कि 41 साल बाद कांग्रेस का वही हाल हुआ है जो 1997 में था। उस वक्त वामपंथियों ने कांग्रेस का सूपड़ा साफ किया था। 1977 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई थी।  उस वक्त सीपीएम को 51 सीटें मिली थी। त्रिपुरा में कांग्रेस ने इस बार 59 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे।

त्रिपुरा में पहली बार विधानसभा चुनाव 1967 में हुए थे। तब कांग्रेस को 27 सीटें मिली थी। सीपीएम को सिर्फ 2 सीटों पर सिमट गई थी। 1972 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जबरदस्त जीत दर्ज की। उसे 41 सीटें मिली थी। तब सीपीएम को सिर्फ 16 सीटें मिली थी। 1983 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बेदखल हो गई। सीपीएम ने 37 सीटों पर जीत दर्ज की जबकि कांग्रेस की झोली में सिर्फ 12 सीटें आई। 1988 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 25 सीटें जीती और गठबंधन सरकार बनाई। 1988 में सीपीएम 26 सीटों पर सिमट गई थी। अगले विधानसभा चुनाव 1993 में हुए। तब कांग्रेस सिर्फ 10 सीटों पर सिमट गई।

1993 के बाद से त्रिपुरा में लेफ्ट फ्रंट की सरकार है। 1993 में सीपीएम को 44 सीटें मिली थी। 1998 में कांग्रेस को सिर्फ 13 सीटें मिली थी। उस वक्त सीपीएम को 38 सीटें मिली थी। 2003 में कांग्रेस ने 13 जबकि सीपीएम को 38 सीटें मिली। 2008 में कांग्रेस ने 10 जबकि सीपीएम ने 46 सीटें जीती। 2013 में कांग्रेस ने 10 सीटें जीती थी। सीपीएम के खाते में 49 सीटें आई। 2018 में कांग्रेस ने सिर्फ लडऩे के लिए चुनाव लड़ा। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी वोटिंग से सिर्फ दो दिन पहले चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे थे।