त्रिपुरा में माणिक को उतार फेंकने के लिए बीजेपी ने असम फॉर्मूले को अपनाया। दरअसल पूर्वोत्तर में अपनी दस्तक देने के लिए बीजेपी ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने का नारा दिया था। इस नारे के चलते जनता ने बीजेपी का साथ दिया और यहां भाजपा की सरकार बनी। ऐसे में लेफ्ट फ्रंट को ढहाने के लिए भी बीजेपी ने इसी फॉर्मूले  का इस्तेमाल किया और बंपर जीत हासिल की। त्रिपुरा में भी अवैध बांग्लादेशियों की बड़ी तादाद है, ऐसे में बीजेपी का यह नारा यहां के बांग्लाभाषी लोगों को लुभाने वाला था। जिसकी काट लेफ्ट की सरकार नहीं तलाश सकी।

बता दें कि त्रिपुरा बंगाली बहुल राज्य है। इन्हें लुभाने के लिए केंद्र सरकार ने 1955 के सिटिजनशिप ऐक्ट में धर्म के आधार पर संशोधन करने की बात कही ताकि अवैध घुसपैठिये कहलाने वाले इन लोगों को भारत की नागरिकता मिल सके। बीजेपी का यह प्रयास बहुसंख्यक समुदाय को लुभाने वाला था। बांग्लादेश की सीमा से सटे त्रिपुरा के बहुसंख्यक समुदाय ने बीजेपी के इन नारों को हाथों हाथ लिया, जहां पूर्वी बंगाल यानी बांग्लादेश से आने वाले प्रवासियों में बड़ी संख्या हिंदुओं की है। 1947 में देश के विभाजन और फिर 1971 के युद्ध के दौरान हिंदू बंगाली शरणार्थियों की बड़ी आबादी त्रिपुरा आकर बस गई थी। इसके चलते यहां के मूल आदिवासी लोग अल्पसंख्यक हो गए हैं।


2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक सूबे की आबादी में 30 फीसदी आदिवासी समुदाय के लोग हैंए जबकि 66 फीसदी लोग गैर-आदिवासी बंगाली हिंदू हैं। बीजेपी यह जानती थी कि त्रिपुरा में आदिवासियों के लिए आरक्षित 20 सीटों पर कब्जा जमाए बगैर लेफ्ट को यहां से उखाडऩा मुश्किल होगा। ऐसे में बीजेपी ने पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा के साथ गठबंधन किया, जो अलग आदिवासी राज्य की मांग करता रहा है। इस तरह बीजेपी ने बंगाली हिंदुओं समेत आदिवासियों को भी साथ जोडऩे का काम किया।


हालांकि अब भी बीजेपी को त्रिपुरा के आदिवासियों को अपने साथ जोडऩे के लिए खासी मेहनत करनी होगी। आदिवासी समुदाय में सिटिजनशिप ऐक्ट में बदलाव को लेकर चिंता का माहौल है। आदिवासी लीडर बिजॉय कुमार ने कहा कि हम अपनी ही जमीन पर अल्पसंख्यक हो चुके हैं। बांग्लादेश से बड़ी आबादी के यहां आने पर ऐसी स्थिति हुई हैं। उन्होंने कहा कि यह स्थिति हमारे लिए बड़ा खतरा है।