बिहार विधान सभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बड़ा दलित कार्ड खेला है। शुक्रवार को सीएम नीतीश कुमार ने अनुसूचित जाति- जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत सर्तकता और मानिटरिंग समिति की बैठक की।  

 अब नीतीश कुमार ने चुनाव के वक्त दलित कार्ड खेलकर 16 प्रतिशत मतदाता को एक झटके में अपनी तरफ करने की कोशिश की है। इस बैठक के बाद सीएम ने अधिकारियों को आदेश दिया कि एससी-एसटी परिवार के किसी सदस्य की हत्या होती है, वैसी स्थिति में पीड़ित परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने के प्रवाधान के लिए तत्काल नियम बनाएं।

इसके अलावा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एससी / एसटी के लंबित कांडों का तेजी से निष्पादन करने, इन्वेस्टिगेशन कार्य को निर्धारित समय में पूरा करने का भी निर्देश दिया। सीएम नीतीश ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि लंबित कांडों का निष्पादन 20 सितंबर 2020 तक पूरा करें साथ ही विशेष न्यायालयों में विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति की प्रक्रिया में तेजी लाएं। 

एक तरफ जहां एनडीए में शामिल लोजपा प्रमुख चिराग पासवान नीतीश से नाराज हैं तो, दूसरी तरफ हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के प्रमुख जीतन राम मांझी अब नीतीश के साथ हैं। एलजेपी प्रमुख चिराग पासवान जहां नीतीश का लगातार हमलावर हैं तो वहीं अब नीतीश को डिफेंड करने जीतनराम मांझी सामने आ चुकें है।

मुख्यमंत्री ने मुख्य सचिव को कहा कि एससी-एसटी से संबंधित जितने भी चर्चा हुई उसके अलावे और क्या योजनायें चलाई जा सकती है वो अपने स्तर पर इसकी समीक्षा करें। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि एससी-एसटी परिवार को मुख्यधारा में जोड़ने के लिए अन्य योजनाओं पर विचार करें।

सुशील कुमार मोदी ने कहा कि लालू प्रसाद जब सत्ता में रहे, तब उनके 15 साल में 118 नरसंहार हुए। दलितों की हत्याएं हुईं, लेकिन उन्हें मुखिया-सरपंच बनने का मौका नहीं दिया गया। वे जब विपक्ष में आये तो पुत्र मोह में दलित नेताओं का अपमान किया। दलित-पिछड़े-अतिपिछड़े समाज के चंद लोगों को शो-रूम आइटम बना कर लालू प्रसाद की पार्टी चुनाव नहीं जीत पाएगी।

 उन्होंने कहा कि आरजेडी-कांग्रेस की सरकार ने 23 साल तक बिहार में पंचायतों का चुनाव नहीं कराया। 23 साल बाद 2003 में चुनाव कराया तो एकल पदों पर दलितों, पिछड़ों व महिलाओं को आरक्षण से वंचित कर उनकी हकमारी की। एनडीए की सरकार आने के बाद इन्हें आरक्षण दिया गया, इसकी वजह से आज हजारों की संख्या में पिछड़ा, अतिपिछ़ड़ा और महिलाएं एकल पदों पर चुनाव जीत कर आ रही हैं।