बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मोदी सरकार सरकार से अंग्रेजों के जमाने में हुए काम को दोबारा करने की मांग की है। दरअसल, बिहार विधानसभा में जाति आधारित जनगणना कराने के लिए प्रस्ताव पारित किया गया। इसमें केंद्र सरकार से मांग की गई कि 2021 की जनगणना जाति आधारित हो। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लंबे समय से जाति आधारित जनगणना कराने की मांग करते रहे हैं। राजद, कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दल इस मुद्दे पर नीतीश के साथ हैं। इससे पहले मंगलवार को सदन में नीतीश ने कहा था कि देश में नई जनगणना होने वाली है। इसमें जाति आधारित जनगणना होनी चाहिए।

पिछले साल जनवरी में एक कार्यक्रम में नीतीश ने कहा था, ‘‘किस जाति के लोगों की संख्या कितनी है, यह मालूम होना चाहिए। देश में आबादी के अनुरूप आरक्षण का प्रावधान हो। अंग्रेजों के जमाने में 1931 के बाद देश में जाति आधारित जनगणना नहीं हुई। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और धर्म के आधार पर जनगणना हुई है। इसी तर्ज पर 2021 में सभी जातियों की जनगणना होनी चाहिए।’’ बिहार विधानसभा में 18 फरवरी 2019 को 2021 में जाति आधारित जनगणना कराए जाने का प्रस्ताव पारित किया गया था।

केंद्र सरकार हर 10 साल पर जनगणना कराती है। जनगणना के मौजूदा फॉर्मेट में यह तो पता चल जाता है कि देश में किस धर्म के कितने लोग हैं और अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति के लोगों की संख्या क्या है। लेकिन यह पता नहीं चलता कि सामान्य, पिछड़ा और अति पिछड़ी जाति के लोगों की संख्या कितनी है। जाति आधारित जनगणना हुई तो यह पता चलेगा कि इनकी संख्या कितनी है। नीतीश का कहना है कि इसके आधार पर सरकार को विकास की दौड़ में पीछे रह गए तबके के लिए अलग से योजनाएं बनाने में मदद मिलेगी।

जाति आधारित जनगणना का संबंध आरक्षण से भी है। नीतीश कुमार की मांग रही है कि देश में आबादी के अनुरूप आरक्षण का प्रावधान हो। वर्तमान में पिछड़ी जातियों को 27% आरक्षण मिलता है। यह पता चलने पर कि पिछड़ी जातियों में किस जाति के लोगों की संख्या कितनी है और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति कैसी है। उनके लिए खास योजना बनाई जा सकती है।


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