आज भले ही कई नए गीतकार व संगीतकार क्यों ना आ जाएं लेकिन पुराने गानों में जो सुकून जो अंदाज़ था वो कोई नहीं बयान कर सकता और यही वजह है की आज कई फिल्मों में पुराने गानों को रीमिक्स किया जाता है।


उस समय की कला और कलाकार अलग ही थे उन्हें आप लैजेंड कहें तो गलत नहीं होगा क्योंकि आज ना तो वैसी कला है और न ही कलाकार और आज ऐसे ही कलाकार की यादों से हम आपको रूबरू करवाएंगे जी हां हम बात कर रहे हैं कवि भूपेन हजारिका की जो भले ही दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी आवाज आज भी ज़िंदा है तो चलिए आज बताते हैं आपको असम के बेटे भूपेन हजारिका की जिंदगी से जुड़े कुछ अहम पल जिन्होंने उन्हें भारत के हम दर्शक और श्रोता का चाहेता बना दिया। हजारिका का जन्म 8 सितंबर 1926 को असम के सदिया में हुआ था। हजारिका ने एक म्यूजिशियन के तौर पर पूरे देश का नाम रोशन किया।

भूपेन हजारिका एक ऐसे कलाकार थे जिनकी कला और आवाज सिर्फ फिल्मी दुनिया के लिए ही नहीं थी बल्कि वो अपने गीतों, संगीत और कविताओं से समाज के उस हिस्से की कहानी भी कहते थे जिसे अक्सर भुला दिया जाता है।
मूल रूप से असमिया और बांग्ला में लिखने वाले भूपेन दा ने कई लोकगीतों और कहानियों को बैलाड फॉर्म में कंपोज किया। गंगा क्यों बहती हो क्यों के अलावा, जमीदारों के किसानों के कंधों पर पालकी में बैठकर चलने को रूपक लेते हुए उन्होंने ‘हे डोला, रे डोला’ रचा।  पेशे से कवि, संगीतकार, गायक, अभिनेता, पत्रकार, लेखक, निर्माता और स्वघोषित ‘यायावर’ हजारिका ने असम की समृद्ध लोक संस्कृति को गीतों के माध्यम से पूरी दुनिया में पहुंचाया।
भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम से एक बहुमुखी प्रतिभा के गीतकार, संगीतकार और गायक थे। इसके अलावा वे असमिया भाषा के कवि, फिल्म निर्माता, लेखक और असम की संस्कृति और संगीत के अच्छे जानकार भी रहे थे. आपको बता दे की भूपेन हजारिका जो के भारत के एक ऐसे विलक्षण कलाकार थे जो अपने गीत खुद लिखते थे, संगीतबद्ध करते थे और गाते थे। उन्हें दक्षिण एशिया के श्रेष्ठतम जीवित सांस्कृतिक दूतों में से एक माना जाता है।


बात करें भूपेन के गानों की तो आज भी लोगो के दिलों में 1993 की रुदाली फिल्म घर कर गयी है जिसमें भूपेन द्वारा गया गया गाना हूम हूम करे है इस गाने से भूपेन हजारिका हर आम हिंदी दर्शक के लिए एक जाना पहचाना नाम हो गए। पर्दे पर दो कैमरों से फिल्माए गए इस गाने के लिए कल्पना लाज़मी ने कोई कोरियोग्रफी नही की थी। पीछे लता मंगेश्कर की आवाज में सुनाई पड़ रहा था, ‘इक बूंद कहीं पानी की, मेरी अंखियों से गिर जाए’। ये गाना और सीन हिंदी सिनेमा के इतिहास के उन दृश्यों में से एक बन गया है जो दर्शकों के दिमाग पर जस के तस छपे हुए हैं।


भूपेन हजारिका ने दो दशक तक प्रतिध्वनि नाम का अखबार निकाला। असम और पूर्वोत्तर को एक साथ लाने के लिए नदियों से जुड़े कई गीत, सांस्कृतिक चीज़ें लेकर आए. इन सबके चलते उन्हें ‘बार्ड ऑफ लोइत’ (लोइत का चारण) भी कहा गया. लोइत असम में ब्रह्मपुत्र को कहते हैं। इसके अलावा भूपेन हजारिका 1967 से 1972 तक असम में विधायक भी रहे. 2004 में वो भाजपा से लोकसभा चुनाव लड़े पर हार गए।

भूपेन की मृत्यु 5 नवंबर 2011 को 85 साल की उम्र में हुई थी लेकिन हिंदी, बंगाली और असमी भाषा में गाये गए उनके गीत, उनकी कविताएं और उनके द्वारा तैयार किए गए संगीत आज भी संगीत प्रेमियों के दिल में हूम हूम करके बस जाते हैं।


अपनी आवाज के जादू से लोगो को मंत्र मुग्ध कर देने वाले भूपेन जी के नाम पर इस साल मई में शुरू हुए देश के सबसे लंबे धोला सादिया पुल का नाम उनके नाम पर रखा गया. ये पुल असम से अरुणाचल की दूरी कई घंटे कम कर देता है. भूपेन दा की पूरी ज़िंदगी इसी प्रयास में बीती कि नॉर्थ-ईस्ट से बाकी देश की दूरी कैसे भी कम हो जाए और आज उनकी इच्छा लगभग पूरी हो गयी है।