आसू ने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार उच्चतम न्यायालय के निर्देश को पूरी तरह से नजरअंदाज कर निचली सुवनसिरी जल विद्युत परियोजना के बांध निर्माण का काम कनूनन गलत होने के बावजूद शुरू करने पर तत्पर है। आसू के केंद्र सरकार से अविलंब इस प्रकार की सभी गतिविधियों पर रोक लगाए जाने की मांग की है।
आसू अध्यक्ष दीपांक कुमार नाथ तथा महासचिव लुरिनज्योति गोगोई ने इस संदर्भ में कहा केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने वर्ष 2008 में इस योजना को हरी झंडी दिखाई थी। इसके बाद बांध का निर्माण कार्य प्रारंभ किया गया। निर्माण के दौरान केंद्र सरकार ने बांध के तकनीकी और पर्यावरण से जुड़े पहलुओं के अध्ययन के लिए एकाधिक विशेषज्ञ कमेटियों ने अपनी रिपोर्ट में इस परियोजना को निचले असम के लोगों की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बताया।
इसके बावजूद केंद्र सरकार बांध के निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने में लगी रही है। बाद में आसू के आंदोलन और राज्यवासियों के दबाव के कारण वर्ष 2006 की 8 दिसंबर को असम सरकार आसू और एनएचपीसी के बीच त्रिपक्षीय बैठक हुई और उसमें लिए गए निर्णय के आधार पर गुवाहाटी और डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों को लेकर एक कमेटी का गठन किया गया।

इस कमेटी की रिपोर्ट में भी इस बांध को भूकंप प्रबल क्षेत्र में स्थापित और निचले असम के लोगों के लिए खतरा बताया लेकिन जमीनी स्तर पर बात कुछ आगे नहीं बढ़ी। आसू के पूर्व उपाध्यक्ष तुलाराम गोगोई के आवेदन के आधार पर कोलकाता स्थित राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण में लंबे समय तक सुनवाई भी चली बाद में यह मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुंच गया और यह मामला अभी भी चल रहा है लेकिन अभी तक कोई समाधान नहीं किया गया है।