गौरतलब है कि भारत के चाय बागानों में काम करने के लिए अंग्रेज चीन से मजदूर लाये थे। जल्द ही ये कामगार यहां की फिजा में घुलमिल गये और कई लोगों ने यहीं की महिलाओं से शादियां भी कर लीं। वे खुद को हिंदुस्तानी समझते हैं और कोई चुनाव ऐसा नहीं गुजरा जिसमें उन्होने वोट नहीं दिया हो।


अकादमी पुरस्कार विजेता रीता चौधरी ने बताया कि 1962 के चीन युद्ध समय इन लोगों को इस डर से राजस्थान में देवली भेज दिया गया कि वे कहीं किसी तरह की जासूसी में शामिल न हो जाएं। उन्होंने इस विषय पर एक उपन्यास ‘‘मकाम’’ भी लिखा है। बाद में इनमें से अधिकतर लोग माकुम, डिगबोई, पानीटोला और तिनसुकिया में बस गए। उनके नाम राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) में दर्ज हैं।


तिनसुकिया के चीना पट्टी इलाके में रेस्त्रां चलाने वाले जॉन वांग (60) की मां ली सू चेन अब 90 बरस की हैं और इस समुदाय की सबसे वृद्ध मतदाता है। जॉन ने बताया, ‘‘मेरा भतीजा राजीव गोगोई, मुंबई में काम करता है और वह वोट डालने अवश्य आता है।’’


सामाजिक कार्यकर्ता अखिल चंद्र बरूआ ने कहा कि माकुम में 16 असमी चीनी परिवार हैं और लोगों की संख्या करीब 30 हैं। राज्य में 50 से कम चीनी परिवार हैं। माकुम इलाका डिब्रूगढ़ लोकसभा संसदीय सीट के अंतर्गत आता है और यहां आज अप्रैल को वोट डाले जायेंगे।