असम सरकार उग्रवादी समूहों के सदस्यों पर दर्ज जघन्य अपराधों के मामलों को वापस नहीं लेगी। भले ही उन्होंने शांति समझौते पर साइन किए हों। सिर्फ वे ही मामले वापस लिए जाएंगे जो जघन्य नहीं हैं। ये मामले भी जिला व राज्य स्तरीय समितियों की सिफारिशों के बाद लिए जाएंगे। मामलों की समीक्षा शांति समझौते पर हस्ताक्षर के बाद होगी। सरकार व संबंधित उग्रवादी समूहों के बीच वार्ता के वक्त मामले वापस नहीं लिए जाएंगे। 

आपको बता दें कि अदालत ने 30 अक्टूबर 2008 के सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में एनडीएफबी(आर) के चेयरमैन रंजन डी. और 13 अन्य को दोषी करार दिया था। एक अंग्रेजी दैनिक ने उच्च पदस्थ सरकारी सूत्रों के हवाले से बताया कि सरकार ने जघन्य अपराधों के मामलों को वापस नहीं लेने का नीतिगत फैसला लिया है और सिलसिलेवार धमाके जघन्य अपराध की श्रेणी में आते हैं। सीरियल ब्लास्ट में 80 से ज्यादा लोग मारे गए थे। इस तरह के मामलों में कानून अपना काम करेगा। 

शांति समझौते पर हस्ताक्षर के बाद सरकार ने उग्रवादी संगठनों के सदस्यों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने के संबंध में नीति अपनाई है। इस बारे में विस्तृत जानकारी देते हुए सूत्रों ने बताया कि जघन्य अपराध के मामलों में कानून अपना काम करेगा। अगर इस तरह के मामलों में पर्याप्त सबूत नहीं मिले तो अदालत आरोपियों को बरी कर सकती है लेकिन सरकार न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करेगी। हालांकि उग्रवादी समूह के सरकार के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर के बाद डिस्ट्रिक्ट व स्टेट लेवल कमेटियां उन मामलों की जांच कर रही है, जिनका नेचर जघन्य नहीं है। 

केस दर केस के आधार पर ये समितियां फैसले लेंगी। सूत्रों ने खुलासा किया है कि डीआईजी रेंज की अध्यक्षता वाली जिला स्तरीय समितियां पहले मामलों की जांच करेगी। इसके बाद ये समितियां सरकार को अपनी सिफारिशें भेजेगी। इसके बाद जिला स्तर की समितियों की सिफारिशों की राज्य स्तरीय समिती समीक्षा करेगी। इसकी अध्यक्षता गृह विभाग का वरिष्ठ अधिकारी करेगा। 

असम पुलिस, स्पेशल ब्रांच और सीआईडी के वरिष्ठ अधिकारी समिति के सदस्य होंगे। अगर समिति महसूस करती है कि कुछ मामले वापस लिए जा सकते हैं तो ये सिफारिश संबंधित उपायुक्त को भेजी जाएगी ताकि अंतिम फैसले के लिए इसे संबंधित अदालतों को रैफर किया जा सके। लेकिन प्रक्रिया शांति समझौते पर हस्ताक्षर के बाद ही शुरू होगी न कि वार्ता प्रक्रिया के दौरान। 

सूत्रों ने स्वीकार किया है कि संघर्ष विराम समझौते के तहत कई बार सरकार ने उग्रवादी समूहों के सदस्यों की ओर से दाखिल जमानत याचिकाओं के खिलाफ आपत्तियां दर्ज नहीं कराई क्योंकि शांति वार्ता के लिए उग्रवादी संगठनों के नेताओं की मौजूदगी जरूरी है। लेकिन इस तरह के लोगों को जमानत की शर्तों का कड़ाई से पालन करना होगा। चूंकि यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम(उल्फा)का वार्ता समर्थक गुट सरकार से वार्ता कर रहा है। ऐसे में सरकार ने संगठन के वरिष्ठ नेताओं की जमानत याचिकाओं का विरोध नहीं किया लेकिन अभी तक किसी भी उल्फा नेता के खिलाफ केस वापस नहीं लिया गया है। 

सूत्रों के मुताबिक यूपीडीएस और डीएचडी के दोनों गुटों के सदस्यों के खिलाफ दर्ज मामलों की अब संवीक्षा की जा रही है क्योंकि ये संगठन सरकार से हुए शांति समझौते पर हस्ताक्षर कर चुके हैं। हालांकि बोडो लिबरेशन टाइगर(बीएलटी) के सदस्यों के खिलाफ दर्ज सभी केस तभी वापस लिए गए जब संगठन ने 2003 में सरकार से शांति समझौता किया। यहां तक कि बीएलटी नेताओं के खिलाफ तब केस वापस लिए गए जब सरकार ने ऐसा करने के लिए कैबिनेट डिसिजन लिया। इन नेताओं के खिलाफ जघन्य अपराध के मामले दर्ज थे।