असम सरकार ने राज्य के विभिन्न हिरासत शिविरों में रह रहे कम से कम 23 और रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार वापस भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इससे पहले बीते सप्ताह सात लोगों को वापस भेजा गया था। सरकारी सूत्रों ने बताया कि अब जिन लोगों को वापस भेजा जाना है वे राज्य के तेजपुर, सिलचर और ग्वालपाड़ा हिरासत शिविरों में रह रहे हैं।

सूत्रों ने बताया कि असम पुलिस ने इन अप्रवासियों की नागरिकता की पुष्टि की प्रक्रिया पूरी कर ली है। इन लोगों ने भी म्यांमार वापस भेजे जाने पर सहमति जता दी है। उधर, म्यांमार सरकार ने भी इनको वापस लेने और इनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का भरोसा दिया है, लेकिन अब तक इन लोगों की वापसी की तारीख तय नहीं हुई है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, दोनों देशों की नोडल एजेंसियां एक-दूसरे के संपर्क में हैं और इन 23 लोगों को चरणबद्ध तरीके से वापस भेजा जाएगा। 

बता दें कि इससे पहले जब असम सरकार ने 7 रोहिंग्यों को म्यांमार भेजा था, उस वक्त संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार संस्था यूएनएचआरसी संस्था ने भारत को खूब खरी खोटी सुनार्इ थी। शरणार्थियों की पैराकार संयुक्त राष्ट्र की इस संस्था को डर सता रहा है कि म्यांमार में इन रोहिंग्या मुसलमानों को सजा का सामना करना पड़ सकता है। क्योंकि देश की सेना पर पहले से ही मुस्लिम अल्पसंख्यकों के नरसंहार का आरोप है। यूएनएचआरसी का आरोप है कि चेताए जाने के बावजूद भारत ने यह कदम उठाया है।

यूएनएचआरसी के प्रवक्ता एंद्रेज माहेसिक ने जिनेवा में संवाददाताओं से कहा था कि भारत में अवैध रूप से घुसपैठ करने के आरोप में 2012 में जेल भेजे गए इन सातों रोहिंग्या मुसलमानों के प्रत्यर्पण से पहले संयुक्त राष्ट्र ने इन सातों के म्यामांर पहुंचने पर इनकी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी। यूएनएचआरसी ने इस बात पर भी चिंता जताई कि उनकी अपील को भारतीय प्रशासन ने नजरंदाज कर दिया। साथ ही भारत पर यह आरोप भी लगाया कि उन्हें कानूनी प्रावधानों के तहत सरकारी वकील भी मुहैया नहीं कराया गया।