असम को लेकर बड़ी खबर है कि सर्बानंद सोनोवाल के चेहरे के बिना भाजपा विधानसभा चुनाव लड़ने जा रही है। असम को लेकर भाजपा ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है और असम की सत्ता में होते हुए भी मुख्यमंत्री उम्मीदवार का चेहरा घोषित किए बिना चुनाव मैदान में उतरेगी। मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल इस बार के चुनाव में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं होंगे।

सम विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा अभी नहीं हुई है, लेकिन सियासत गरमा गई है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पिछले महीने ही नलवारी में बड़ी रैली करके बीजेपी के चुनाव अभियान की शंखनाद कर दिया था, जिसके बाद से पीएम नरेंद्र मोदी से लेकर बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा तक कई रैलियां कर चुके हैं। बीजेपी असम में किसी तरह को कोई जोखिम भरा कदम नहीं उठाना चाह रही है। यही वजह है कि बीजेपी ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है और असम की सत्ता में होते हुए भी बिना मुख्यमंत्री उम्मीदवार का चेहरा घोषित किए हुए चुनाव मैदान में उतर रही है।खबर है कि असम में पार्टी के अंदरुनी कलह से बचने के लिए बीजेपी ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है। बीजेपी सत्ता में रहते हुए पहली बार किसी भी नेता को मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं बनाएगी। इसका मतलब साफ है कि मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल इस बार के चुनाव में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं होंगे। हालांकि, 2016 में असम विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने सर्बानंद सोनोवाल को सीएम चेहरा घोषित किया था जबकि तब वो केंद्र की मोदी सरकार में मंत्री थे। ऐसे में आखिर क्या वजह है कि इस बार बीजेपी उन्हें सीएम का चेहरा बनाने से बच रही है।इस वक्त असम की सियासत में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए हेमंत बिस्वा शर्मा का सियासी कद काफी बढ़ गया है और दिलीप सैकिया जैसे ताकतवर नेताओं की मौजूदगी मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल पर भारी पड़ रहीं हैं। विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी किसी तरह का कलह पार्टी में नहीं चाहती है। इसीलिए बीजेपी बिना सीएम का चेहरा घोषित किए चुनाव में उतरने की रणनीति अपना रही है।असम में पार्टी के नेताओं में इस बात को लेकर पहले से ही नाराजगी थी कि मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल का पार्टी विधायकों और क्षेत्रीय नेताओ के साथ कोई समन्वय नहीं है। हालांकि, पार्टी स्तर देखा जाए तो सीएम सोनोवाल का बैकग्राउंड बीजेपी और संघ की पृष्ठभूमि का नहीं हैं। इसके बावजूद बीजेपी ने 2016 में उन्हें सीएम बनाने का फैसला किया था।असम के दिग्गज नेता दिलीप सैकिया को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया तो वहीं हेमंत बिस्वा सरमा बीजेपी की अगुवाई वाले  पूर्वोत्‍तर लोकतांत्रिक गठबंधन के चेयरमैन हैं। हेमंत बिस्वा शर्मा पूर्वोत्तर में बीजेपी के सबसे मजबूत स्तंभ हैं और पार्टी के सबसे बड़े संकटमोचक भी माने जाते हैं। ऐसे में बीजेपी सर्बानंद सोनोवाल नेतृत्व में चुनाव में जाकर हेमंत बिस्वा सरमा और दिलीप सैकिया को नाराज करने का जोखिम भरा कदम नहीं उठा सकती है। सूत्रों के अनुसार ऐसे में पार्टी ने तय किया है कि चुनाव नतीजे के बाद पार्टी फैसला लेगी कि कौन बनेगा मुख्यमंत्री।गौरतलब है कि बीजेपी अक्सर अपने शासन वाले राज्यों में मुख्यमंत्री को ही सीएम कैंडिडेट चेहरा बनाकर चुनावी मैदान में उतरती रही है। उदाहरण के तौर पर बीजेपी ने 2018 में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान और 2019 में महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में तत्कालीन मुख्यमंत्रियों के नेतृत्व में पार्टी ने विधानसभा में चुनाव लड़ने का फैसला किया था।हरियाणा को छोड़कर बाकी सभी जगहों पर पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा था और सत्ता भी गवांनी पड़ी थी। हालांकि, हरियाणा में भी बीजेपी नुकसान हुआ था और पार्टी बहुमत से पांच सीटें दूर रह गई थी। ऐसे में सरकार बनाने के लिए दुष्यंत चौटाला की पार्टी जेपीपी के साथ गठबंधन करना पड़ा था।वहीं, 2014 के बाद पहली बार गोवा में यह अपवाद हुआ जब वहां की राजनीतिक परिस्थिति को देखते हुए तत्कालीन सीएम लक्ष्मीकान्त पार्सेकर को मुख्यमंत्री का कैंडिडेट घोषित नहीं किया था। अब इसी तरह की कुछ परिस्थितियां चुनाव से पहले असम में भी बन गई है। इसीलिए बीजेपी सर्बानंद सोनोवाल को आगे करके चुनाव लड़ने से बच रही है।इस बार असम में एक तरफ कांग्रेस बदरूद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ़ के साथ साथ दूसरी छोटी पार्टियों से भी गठबंधन कर कर बीजेपी को कड़ी चुनौती देने की तैयारी में है तो दूसरी तरफ बीजेपी की अंदरूनी लड़ाई थमने का नाम नहीं ले रही है। ऐसे में अब देखना है कि चुनाव से पहले बीजेपी कैसे एंटी इनकम्बेंसी साथ-साथ पार्टी की आंतरिक लड़ाई से पार पाती है।